Saturday, 26 September 2015

स्वप्न

स्वपनो को रोका है किसने सपने आते जाते है।
कुछ सपने देते खुशिया कुछ सपने रुलाते है।
मैने भी एक सपना देखा जिसमे तू शहजादी थी ;परियो जैसे पंख तेरे पास कभी ना आती थी ।
उड़ते उड़ते दूर गगन में तू कही छिप जाती थी ।
आँख खुले जब उन सपनो को भूल नही हम पातेहै।
सपनो को रोका है किसने सपने आते जाते है।
मेरी रातो के सपनो में एक चाँद था दूर गगन में ।
चाँद जिसे में समझी थी वो तेरी ही तो सूरत थी ।
मेरी रातो की तन्हाइयो को तेरी बहुत जरूरत थी।बात यही सच्ची है साजन आज तुम्हे बताते है।
सपनो को रोका है किसने सपने आते जाते है।।
nav prabhat

Thursday, 17 September 2015

शब्द

कभी सहज कभी उलझा सा शब्दों का जंजाल।
जिसके पास शब्द नही है वो है एक कंगाल।।
सहज सम्बन्ध बनते शब्दों से।
कागज पर लगते धब्बों से।।अंर्तरमन की गहराइयो में समाते है।
शत्रु को भी बोल दो मीठे।सच्चा मीत बनाते है।।