Monday, 10 November 2025

आजादी की मिट्टी है

आजादी की मिट्टी है 
सुगंध तुम्हारी है
तुम भाल हो भारत के 
यह मातृ हमारी है

Friday, 12 September 2025

मेरे शहर का असूल है

[Verse 1 / Sher 1]

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना,

मजलूम और मजबूर को देता नहीं पनहा।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना,

मजलूम और मजबूर को देता नहीं पनहा।

​[Verse 2 / Sher 2]

हर तरफ खिड़कियों से झाकते हैं लोग,

यहां किसी के दिल में भूल से भी झाकना है मना।

हर तरफ खिड़कियों से झाकते हैं लोग,

यहां किसी के दिल में भूल से भी झाकना है मना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना....

​[Interlude / Music Piece]

​[Verse 3 / Sher 3]

रुक कर भी नहीं देखते वो कौन था? ए दोस्त,

पत्थर के घर वालों का दिल भी पत्थर से था बना।

रुक कर भी नहीं देखते वो कौन था? ए दोस्त,

पत्थर के घर वालों का दिल भी पत्थर से था बना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

​[Verse 4 / Sher 4]

यहां वक्त की रफ्तार भी वक्त से बहुत तेज है,

किसी इंसान को चार पल वक्त भी देना है मना।

यहां वक्त की रफ्तार भी वक्त से बहुत तेज है,

किसी इंसान को चार पल वक्त भी देना है मना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

​[Interlude / Music Piece]

​[Verse 5 / Sher 5]

आंसुओ से भरी नई दास्तान हर रोज लिखता है मेरा शहर,

हमदर्दी का मरहम किसी को भी  लगाना है मना।

आंसुओ से भरी नई दास्तान हर रोज लिखता है मेरा शहर,

हमदर्दी का मरहम किसी को भी  लगाना है मना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

​[Verse 6 / Sher 6]

दम घुटता सा लगता है अब अपने ही शहर में,

जज्बात-ए-दिल किसी से कहना भी है मना।

दम घुटता सा लगता है अब अपने ही शहर में,

जज्बात-ए-दिल किसी से कहना भी है मना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

​[Interlude / Music Piece]

​[Verse 7 / Sher 7]

अपना ही चेहरा अपने से नजर  जुदा सा  आता है,

जाने किसने बनाया है उम्मीदों का इक ऐसा आईना।

अपना ही चेहरा अपने से नजर  जुदा सा  आता है,

जाने किसने बनाया है उम्मीदों का इक ऐसा आईना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

​[Outro / Makta]

मंदिर मस्जिदों में खुदा से खुदा जुदा है ',

मजहब के नाम पर कर दिया शैतानों ने मेरा शहर फना।

मंदिर मस्जिदों में खुदा से खुदा जुदा है 'प्रभात',

मजहब के नाम पर कर दिया शैतानों ने मेरा शहर फना।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना,

मजलूम और मजबूर को देता नहीं पनहा।




[Intro - Both Voices in Harmony]

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना,

मजलूम और मजबूर को देता नहीं पनहा।

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना,

मजलूम और मजबूर को देता नहीं पनहा।

[Verse 2 - Female Lead]

हर तरफ खिड़कियों से झाकते हैं लोग,

यहां किसी के दिल में भूल से भी झाकना है मना।

हर तरफ खिड़कियों से झाकते हैं लोग,

यहां किसी के दिल में भूल से भी झाकना है मना।

[Chorus - Male Lead]

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना....

[Verse 3 - Male Lead]

रुक कर भी नहीं देखते वो कौन था? ए दोस्त,

पत्थर के घर वालों का दिल भी पत्थर से था बना।

रुक कर भी नहीं देखते वो कौन था? ए दोस्त,

पत्थर के घर वालों का दिल भी पत्थर से था बना।

[Chorus - Female Lead]

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

[Verse 4 - Female Lead]

यहां वक्त की रफ्तार भी वक्त से बहुत तेज है,

किसी इंसान को चार पल वक्त भी देना है मना।

यहां वक्त की रफ्तार भी वक्त से बहुत तेज है,

किसी इंसान को चार पल वक्त भी देना है मना।

[Chorus - Both Voices]

मेरे शहर का असूल है हंसना है मना.....

[Verse 5 - Male Lead]

आंसुओ से नई दास्तान हर रोज लिखता है मेरा शहर,

हमदर्दी का मरहम किसी को भी लगाना है मना।

आंसुओ से भरी नई दास्तान हर रोज लिखता है मेरा शहर,

हमदर्दी का मरहम किसी को भी लगाना है मना।

[Verse 6 - Female Lead]

दम घुटता सा लगता है अब अपने ही शहर में,

जज्बात-ए-दिल किसी से कहना भी है मना।

दम घुटता सा लगता है अब अपने ही शहर में,

जज्बात-ए-दिल किसी से कहना भी है मना।

[Verse 7 - Both Voices / Deep Emotion]

अपना ही चेहरा अपने से जुदा सा नजर आता है,

जाने किसने बनाया है उम्मीदों का इक ऐसा आईना।

अपना ही चेहरा अपने से जुदा सा नजर आता है,

जाने किसने बनाया है उम्मीदों का इक ऐसा आईना।

[Outro / Makta - Male Lead then Both]

मंदिर मस्जिदों में खुदा से खुदा जुदा है 'प्रभात',

मजहब के नाम पर कर दिया शैतानों ने मेरा शहर फना।

[Both Harmony]

मंदिर मस्जिदों में खुदा से खुदा जुदा है 'प्रभात',

मजहब के नाम पर कर दिया शैतानों ने मेरा शहर फना।

"A soulful and melancholic Duet Ghazal, Male and Female singers with deep emotional texture, singing in harmony and alternating verses. Slow tempo, atmospheric Indian arrangement featuring a haunting Bansuri (flute), Sarangi, and soft Tabla. The mood is dark, lonely, and reflective. High emotional intensity in the vocals to express the pain of an apathetic city. Clear Hindi/Urdu diction, cinematic soulful fusion, 4k high-quality audio."

Tuesday, 13 May 2025

अजीम गुनाह


इस्लाम की दुनिया में फ़जियत कराने वालों।
दुनिया में इंसानियत का खून बहाने वालों ।


आतंक‌ ही तुम्हारा खुदा और ईमान है,
 इस्लाम का नाम तुमने किया बदनाम है।।
सारी दुनिया को धोखा दे सकते हो तुम,
खुदा के सामने कैसे मुकर सकते हो तुम, 
कयामत होगी फैसला होगा कयामत चाहने वालों,
इस्लाम की दुनिया में फ़जियत कराने वालों।
इस्लाम की दुनिया में फ़जियत कराने वालों,
दुनिया में इंसानियत का खून बहाने वालों। .......
यह जमी ही है मगर  तुमको तो जन्नत चाहिए
पुकारते हैं, सभी तम्हें अब भी लौट, आईये,वेगुनाहो का खून बेवजह अब मत बहाईये.......
गर बची हो तो गैरत दुनिया को दिखलाइए,
खुदा की जन्नत में आग लगाने वालों।

आतंक‌ ही तुम्हारा खुदा और ईमान है।
 इस्लाम का नाम तुमने किया बदनाम है।......
आतंक‌ ही तुम्हारा खुदा और ईमान है,
 इस्लाम का नाम तुमने किया बदनाम है।।

यकीन नही होता‌ अब कि तुम इंसान हो,,,. ,,,  
इंसान की खाल में तुम तो शैतान हो.
इस जमाने में अब तुम्हारी यही पहचान है। 
आतंक‌ ही तुम्हारा खुदा और ईमान है।
 इस्लाम का नाम तुमने किया बदनाम है।।

जानकर तुमको दुनिया भी अब हैरान है,
कहते इस्लाम जिसको तुमने समझा कहाॅं,
मोहम्मद का इस्लाम भाईचारे का पैगाम है,
आतंक‌ ही तुम्हारा खुदा और ईमान है।
 
इस्लाम की दुनिया में फ़जियत कराने वालों।
दुनिया में इंसानियत का खून बहाने वालों .......





Wednesday, 30 April 2025

स्वर्ण तराजू में रिश्ते ना तौल

[SPOKEN WORD] 
[VERSE 1]
स्वर्ण तराजू में, 
रिश्ते ना तौल......
सामाज की विरासत,
ये डौर अनमोल।
सबसे सरस पिता पुत्री का नाता, 
पिता अपनी पुत्री को बाहों में झूलाता।
वही बनती हैं बहन बुआ और माता,
वही तो है इस समाज की विधाता।
बड़े चाह से पिता उसकी डोली सजाता,
विदा जब करता है.... चुपके चुपके आंसू बहाता।
बेटी दो घर का मान बढाती,
डोली में आती अर्थी ही में जाती।
यही है दुर्गा यही है काली, 
बड़ा भग्यशाली है इसका माली।
बेटी तो चाहे दो मीठे बोल,
स्वर्ण तराजू में,
रिश्ते ना तौल....
सामाज की विरासत,
ये डौर अनमोल।
[VERSE 2]
पुत्र से पिता का जन्मों का नाता,
पिता तो है पुत्र का भाग्य विधाता।
झलक पुत्र में पिता को अपना युवान आता,
जो स्वयं जो ना कर सका....पुत्र से चहाता।
अपने से आगे उसको बढ़ाता,
ये रिवाज वो खुद भी निभाता......
चांद सी दुल्हन वह ब्याह करके लाता,
पिता की वंश बेल आगे बढ़ाता।
तब आंगन में बजते, खुशियों के ढोल....
स्वर्ण तराजू में,
रिश्ते ना तौल.....
सामाज की विरासत, 
ये डौर अनमोल।

हर एक संबंध रिश्तो की गाथा,
इन संबंधों की अपनी, है एक मर्यादा.... 
हर व्यक्ति अधूरा,यह समाज अधूरा, 
इसकी पू्र्णता मैं बंधा एक से दूसरे से छोर....
 नाजुक बडी हैं, रिश्तो की डौर....
स्वर्ण तराजू में, 
रिश्ते ना तौल.....
सामाज की विरासत, 
ये डौर अनमोल।

QUTRO
स्वर्ण तराजू में 
रिश्ते ना तौल।
सामाज की विरासत 
ये डौर अनमोल।।
सबसे सरस पिता पुत्री का नाता। 
पिता अपनी पुत्री को बाहों में झूलाता।।
वही बनती हैं बहन बुआ और माता।
वही तो है इस समाज की विधाता।।


. Song Style (इसे Style बॉक्स में पेस्ट करें)

​यह सेटिंग म्यूजिक को धीमा रखेगी और आवाज को भारी और गंभीर बनाएगी ताकि यह गाना न लगे।

Copy & Paste:

Hindi Spoken Word, Emotional Poetry Recitation, Deep Male Voice, Cinematic Ambient Background, Slow Tempo, Minimalist, Touching, No Drums


​2. Lyrics (इसे Lyrics बॉक्स में पेस्ट करें)

​मैंने इसमें [Tags] और (...) का इस्तेमाल किया है ताकि AI इसे रुक-रुक कर, भावुकता के साथ पढ़े।

Copy & Paste:

[Intro: Soft Emotional Piano]

​[Spoken Word]

(Deep and slow voice)

स्वर्ण तराजू में...

रिश्ते ना तौल।

​(Pause)

​सामाज की विरासत...

ये डौर अनमोल।।

​[Spoken Verse]

(With feeling)

सबसे सरस... पिता पुत्री का नाता।

पिता अपनी पुत्री को... बाहों में झूलाता।।

​[Emotional Climax]

(Intense narration)

वही बनती हैं बहन... बुआ... और माता।

वही तो है... इस समाज की विधाता।।

​[Outro]

(Fade out with soft music)


​3. Title (Title बॉक्स में)

Rishte: Ek Virasat


Hindi Spoken Word, Cinematic Duet, Male and Female Vocals, Emotional Storytelling, Soft Bansuri and Piano, Slow Tempo, Heartfelt, Indian Classical Touch

Tuesday, 29 April 2025

अब महफिलो में हमें हंसना हंसाना आ गया

[Intro]
(Soft Piano and Melodic Flute)

[Chorus - Male]
अब महफिलों में हमें, हंसना हंसाना आ गया
दिल के दुश्मनों के सामने, हमें मुस्कुराना आ गया

[Chorus - Female]
अब महफिलों में हमें, हंसना हंसाना आ गया
दिल के दुश्मनों के सामने, हमें मुस्कुराना आ गया

[Verse 1 - Male]
टूट के चाहा था तुमने, यह भी हमको याद है
आईना बन के खुद सामने, ये जमाना आ गया

[Hook - Both Harmony]
दिल के दुश्मनों के सामने, हमें मुस्कुराना आ गया

[Verse 2 - Female]
हक है तुम्हारा इस जिंदगी पे, था ये तुमने कहा
तुमने था जो हमसे कहा, हमको निभाना आ गया

[Hook - Female]
दिल के दुश्मनों के सामने, हमें मुस्कुराना आ गया

[Bridge - Male]
(Emotional High Pitch)
प्यास लबों की बढ़ रही है, ना तुमने कहा ना हमने कहा
जाने कैसे इन आंखों को, सब कुछ  बताना आ गया

[Verse 3 - Female]
रोशनी थी प्यार की मगर, चांदनी अब थी कहां
इन अंधेरों में तेरी यादों का, उजाला छा गया

[Chorus - Both Together]
अब महफिलों में हमें, हंसना हंसाना आ गया

[Verse 4 - Male]
खामोश रहना खूब था, तुमने कहा हमने सुना
अब ये और बात है, हमको भी कहना आ गया

[Chorus - Female]
अब महफिलों में हमें, हंसना हंसाना आ गया

[Outro - Duet]
(Soft and Uplifting)
चल रही थी सपनों के सहारे, खामोश सी जिंदगी
सपने जब पूरे हुए, इसे चहकना भी आ गया

[Ending - Harmony]
अब महफिलों में हमें, हंसना हंसाना आ गया
हंसना हंसाना आ गया...
(Fade out with Flute)
अब महफिलो में हमें हंसना हंसाना आ गया 
दिल के दुश्मनों के सामने हमें  मुस्कुराना आ गया........








Monday, 28 April 2025

रुकता कब जिंदगी का काफिला किसी





[Chorus]
रुकता नहीं जिंदगी का कांरवा किसी एक मुकाम पर
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
अब किसी और शहर में बसेरा होगा

[Verse 1]
रुकने का नाम मौत है चलने का जिंदगी
परवाह नहीं है कहां राह में अंधेरा होगा
रुकने का नाम मौत है चलने का जिंदगी
परवाह नहीं है कहां राह में अंधेरा होगा

[Chorus]
रुकता नहीं जिंदगी का कांरवा किसी एक मुकाम पर
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
अब किसी और शहर में बसेरा होगा

[Verse 2]
अब खुशियों से मेरा कोई वास्ता नहीं
बस हर किसी का गम मेरा अपना होगा
अब खुशियों से मेरा कोई वास्ता नहीं
बस हर किसी का गम मेरा अपना होगा

[Chorus]
रुकता नहीं जिंदगी का कांरवा किसी एक मुकाम पर

[Verse 3]
उदासियों से भरे चेहरे पर गर ला सकूं मुस्कान
इस जहां में सबसे खूबसूरत नसीब मेरा होगा
उदासियों से भरे चेहरे पर गर ला सकूं मुस्कान
इस जहां में सबसे खूबसूरत नसीब मेरा होगा

[Bridge]
रुकता नहीं जिंदगी का कांरवा किसी एक मुकाम पर
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
[Verse 4]
शमा की बुझती हुई लौ बता रही है प्रभात मुझे
सिया अंधेरों में हौसलों से भरा उजाला होगा
शमा की बुझती हुई लौ बता रही है प्रभात मुझे
सिया अंधेरों में हौसलों से भरा उजाला होगा

[Outro]
रुकता नहीं जिंदगी का कांरवा किसी एक मुकाम पर
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
अब किसी और शहर में बसेरा होगा
(Fade out)




रुकता कब जिंदगी का काफिला किसी एक मुकाम पर,
अब किसी और शहर में बसेरा होगा।

 रुकने का नाम मौत है चलने का जिंदगी,
परवाह नहीं है कहां राह में अंधेरा होगा।

रुकता कब जिंदगी का काफिला किसी एक मुकाम पर,
अब किसी और शहर में बसेरा होगा।

 अब खुशियों से मेरा कोई वास्ता नहीं,
बस हर किसी का गम मेरा अपना होगा।

रुकता कब जिंदगी का काफिला किसी एक मुकाम पर,
अब किसी और शहर में बसेरा होगा।

उदासियों से भरे चेहरे पर गर ला सकूं मुस्कान,
इस जहां में सबसे खूबसूरत नसीब मेरा होगा।

रुकता कब जिंदगी का काफिला किसी एक मुकाम पर,
अब किसी और शहर में बसेरा होगा।

शमा की बुझती हुई लो बता रही है 'प्रभात'मुझे।
 सिया अंधेरों में हौसलों सेक्षभरा उजाला होगा।।

रुकता कब जिंदगी का काफिला किसी एक मुकाम पर,,.......










Thursday, 24 April 2025

मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने

मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है
मजहबी जुनून में गोली और गोलो से
झूलसते और मरते इंसानों को हमने देखा है 

‌ अरे ओ खुद को इंसान समझने वालो
 हैवानियत का खेल और कब तक खेलोगे 
मिट जाएगा नामो-निशा जमी से तुम्हारा 
इंसानों की लाशों से और कब तक खेलोगे
तुम्हारे शहंशाहों को सिमटते
हमने देखा है ।।
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है........(1)
ना छू पाए तुम बुलंदियों को आसमानों की 
बस लाशों से खेलते रहे तुम अब तक।
बेगैरत हो अपने मजहब का मजाक बनाया तुमने।
मजहब के नाम पर लाशे बिछाते रहे हो अब तक 
चंद सिक्कों की खनक तुम्हें सुनते हमने देखा है
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है
......... (2)

तुम्हारे मजहब ने पिया है लहू तुम्हारा भी 
तुम मोहब्बत भला गैरों से करोगे कैसे 
इंसानियत से तो तुम्हारा नहीं दूर का रिश्ता 
तुम भला इंसानों की हिमायत करोगे कैसे
बस कफन की खैरात बाटते तुम्हें हमने देखा है 
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है ...........(3)
बस यही नसीहत है आतंक के शैतानों 
बहाना बंद करो लहू अब इंसानों का।
अपनी कौम के गद्दार तुम कहलाओगे 
 गुमनामी की मौत मरोगे कफन भी ना पाओगे 
तुम्हारे आकाओं  को गोली से मरते हमने देखा है
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है
 .........(4)
तुम्हारा अरमान क्या है सभी को मैंबताता हूं 
तुम्हारी असली सूरत इस जमाने को मैं दिखाता हूं 

तुम अपने वास्ते चाहते हो  जमाने भर की दौलत को
तुम्हें इंसानियत का रास्ता मैं दिखाता हूं 
कलम और ‌ कलाम दे दो अपने बच्चों के हाथों को 
बंदूक उनको  सौपते तुमको हम सबने देखा है----5

जन्नत का रास्ता जो है मैं तुम्हें दिखाता हूं
तुम्हारे मजहब में रूहू जन्नत की बसती है
इस्लाम में भाई चारा है जो उसकी हस्ती है 
जन्नत की हूरों का सपना तुमने खूब दिखाया है
तुम्हें एक मां के लिए आहे भरते हमने देखा है------6

ये सारी कायनात तो खुदा ने ही बनाई है।
इतना बता दो   सबको तुम्हारी खुदा से ही लड़ाई है
इसी जमी पे इंशा की  जन्नत और दोजक है।
तुम्हें जन्नत में आग लगाते हुए हमने देखा है।------7
'प्रभात' अब अमन की राह पर चलना ही बेहतर है,
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने,
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है।
'प्रभात' अब अमन की राह पर चलना ही बेहतर है,
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने,
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है।
​[Outro]
[End








 

Tuesday, 22 April 2025

मेरे ख्याल ही मेरे हैं

मेरे ख्याल ही मेरे हैं इन खयालों मे मुझको रहना है 
वक्त गया है अब जमाने को अलविदा कहना है
इस जहां में हंसी ख्वाबो सजाया मैंने
 जहां भर में गैरों को  अपना बनाया मैंने 
नींद टूटी तो वेदम हकीकत को पाया मैंने
अब हर सितम इसका मुझको सहना है 
वक्त आ गया है..................(1)
शायद यह उम्र का तकादा है 
जो मिला अब तक बहुत ज्यादा है 
जिंदगी पिटा हुआ एक प्यादा है
एक किनारे  पर ही मुझको रहना है  
वक्त आ गया है...,..........(2)
गुमनामी भली है शोहरत से
नफरत भली है तेरी मोहब्बत से
हैसियत मिलती नहीं किसी दौलत से
सिर्फ सेहत का क्या मुझको क्या करना है 
वक्त आ गया है...................(3)

गजल: उम्र का तकादा
​(मुखड़ा / कोरस)
​शायद यह उम्र का तकादा है,
जो मिला अब तक बहुत ज्यादा है।
जिंदगी पिटा हुआ एक प्यादा है,
एक किनारे पर ही मुझको रहना है।
वक्त गया है अब जमाने को अलविदा कहना है।
​शेर - 1
मेरे ख्याल ही मेरे हैं, इन खयालों में मुझको रहना है,

शह और मात का खेल है मुझे कसी धोखे में नहीं रहना है

इस जहां में हंसी ख्वाबों को सजाया मैंने,
जहां भर में गैरों को अपना बनाया मैंने।
[कोरस की ओर वापसी]
शायद यह उम्र का तकादा है...
​[शेर - 2]

भीड़ में चलते रहे ताउम्र हम अकेले ही,
  वो कब अपना था जो साथ में था हमसाया

जमाने भर की तपस साथ है मेरे 

मुझे इसमें ही झुलस्ते रहना है



नींद टूटी तो बेरहम हकीकत को पाया मैंने,

अब हर सितम इसका चुपचाप सहना है।
(कोरस की ओर वापसी)
शायद यह उम्र का तकादा है...
​शेर - 3
गुमनामी भली है अब इस झूठी शोहरत से,
नफरत भली है दिखावे की तेरी मोहब्बत से।
हैसियत मिलती नहीं यहाँ किसी दौलत से,
सिर्फ सेहत का अब मुझको क्या करना है।
(कोरस की ओर वापसी)
शायद यह उम्र का तकादा है...
​शेर - 4 (मक्ता)
जब कलम थके और शब्द भी रुकने लगें,
तब खामोशी ही सबसे ऊँची सदा (आवाज़) है।
मिटा के हस्ती अपनी इस 'सृष्टि' के कण-कण में,
अब शून्य की लहरों में ही मुझको बहना है।
(कोरस की ओर वापसी)
शायद यह उम्र का तकादा है...




Tuesday, 15 April 2025

आज के दौर में

आज के दौर में जाने कहां 
किन महफिलों में खो गए रिश्ते 
सबके सीने में दिल है मगर 
 मिलते नहीं दिल के रिश्ते

झूठी खुशियों में ढूंढते हैं सुकून दिल का
सच्ची खुशियों से दूर हैं सच्चे रिश्ते 
आज के दौर में जाने कहां ........(1)

अपनों से गैर भी भले हैं यारों 
जो नजरों में सजाते हैं प्यार के रिश्ते 
आज के दौर में जाने कहां ..........(2)

 दौलत की तराजू में तोले जाते हैं रिश्ते
फुर्सत कहां किसी को सजा प्यार से रिश्ते 
आज के दौर में जाने कहां ............(3)