इस शाम को रोशनी कीचाहत है
क्योकर।
ये दिल ही जाने उसे अंधेरो की आदत क्योकर है
शमा तो महफिल मे उजाले के लिए जलती है
नादान परवानो को जलने कीचाहत है क्योकर।
इस शाम को रोशनी कीचाहत है
क्योकर।
ये दिल ही जाने उसे अंधेरो की आदत क्योकर है
शमा तो महफिल मे उजाले के लिए जलती है
नादान परवानो को जलने कीचाहत है क्योकर।
स्वपनो को रोका है किसने सपने आते जाते है।
कुछ सपने देते खुशिया कुछ सपने रुलाते है।
मैने भी एक सपना देखा जिसमे तू शहजादी थी ;परियो जैसे पंख तेरे पास कभी ना आती थी ।
उड़ते उड़ते दूर गगन में तू कही छिप जाती थी ।
आँख खुले जब उन सपनो को भूल नही हम पातेहै।
सपनो को रोका है किसने सपने आते जाते है।
मेरी रातो के सपनो में एक चाँद था दूर गगन में ।
चाँद जिसे में समझी थी वो तेरी ही तो सूरत थी ।
मेरी रातो की तन्हाइयो को तेरी बहुत जरूरत थी।बात यही सच्ची है साजन आज तुम्हे बताते है।
सपनो को रोका है किसने सपने आते जाते है।।
nav prabhat
कभी सहज कभी उलझा सा शब्दों का जंजाल।
जिसके पास शब्द नही है वो है एक कंगाल।।
सहज सम्बन्ध बनते शब्दों से।
कागज पर लगते धब्बों से।।अंर्तरमन की गहराइयो में समाते है।
शत्रु को भी बोल दो मीठे।सच्चा मीत बनाते है।।
[SPOKEN WORD]
[VERSE
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
अपने अस्तित्व के लिए
प्रतिबन्ध रहित स्वतंत्रता और विश्व विनाश व् हिंसा का ये साधक।
चौपाए सदर्श मनुज नगरो में उत्पात मचाता जा रहा है।
नव भौतिकता व् अनुदार दर्शन की ये सन्तति
धन की अभिलाषा से प्रेरित।
निरीह मनुज समुदाय को हिंसक पशु बन चबाता जा रहा है।
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
[VERSE
मात्र मूक दर्शक
सभ्य विश्व का अग्रणी नेतत्व।
स्वहित प्रेरणा से अभिभूत।
अपने उद्देश्यों को दृष्टि में रख ,इस नव वाद की परिभाषा बताता जा रहा है।
इस मदमस्त हाथीके पैर में ।जंजीर बाँधने को आतुर विश्व नेतत्व
भेष आखेटक का धर ।
विश्वरुपीजंगल में भटकता जा रहा है।
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
[VERSE 3]
निसन्देह रक्त रक्त है।
विश्व धरा भी एक है।
विश्व के एक भाग में
रक्त रंजित भूमि देख
सभ्य विश्व क्रोधित हो।
आखेटक बन गया है।
इस नरभक्षी दानव का ।
अन्यत्र विश्व में जब ये।
भक्षण करता है मानव का ।सभ्य विश्व मूक है शांत है।
जैसे जलीय सम्राट प्रशांत है।
जिसकी शांति भी भंग होती है
इन्ही आखेटको की हुंकारों से ।
जब ये हुंकार इस दानव के कानो में पड़ती हे उसे अपनी मृत्य का आभास होता है। अपने छद्मरूप में अदृश्य हो वो स्वयं
आखेटक बन जाता है।
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
[Verse 4]
अपने अहंकार से भर्मित हो।अभिदान दे रहे है प्राणों का।
दंभ में चूर हो मिथ्या ही।
दुरूपयोग कर रहे है अपने वाणो का ।
नरभक्षी दानव उन्ही के साधन्य में,
उनका ही रक्त चूस ,शक्ति वर्धन करता जा रहा है
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
[Verse 5]
संचितशक्ति का पुनः चमत्कार निकट भविष्य में ।
आतुरता समाये अपने में ।
वह प्रतीक्षारत है,आखेटको के खेमो में ।
वो हिंसक छद्मरूप परिवर्तित कर।
अपना विश्व भूमि पर ,
मुखोटा दिखाता जा रहा है।
रक्तपान ही उसका नित्य भोजन है।
उसके लिए क्या सौ योजन है।
अपने एक एक कदम से सौ सौ योजन नापता जा रहा है।
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
कालचक्र भ्रम में फसें आखेटक।उस नरभक्षी दानव को ।अभयदान दे रहे है प्राणों का ।
नेपर्थ्य मेंसाधन्य उपलब्ध करा ।
रक्षक सभ्य विश्वऔर मानव का ।परोक्ष ही संरक्षण कर रहा है।उस रक्त पिपासु दानव का ।
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
भ्रम जाल की काली माया कब तक।
विश्व को भ्रमित करती रहेगी।
विश्व स्वय आतुर होगा ।बध करने को इस दानव का ।
समय चक्र घूमता चहु दिशा।
नवजागृति का प्रकाश लिए ।
उद्घोष कर रहा है।
मै प्रस्तुत हूँ।
साहस और उत्साह करो।
विश्व शांति व् मानव रक्षार्थ।
नरभक्षी इस दानव का
अन्त सुनिशिचित है।
बस एक बार करना होगा।
अभिनंदन मानव और मानवता का।
[QUTRO]
आतंक आतंक चारों ओर एक ही शोर।
पिंघले शीशे की भाँति कानो में समाता जा रहा है।ह्रदय में करुणा वेदना भरता जा रहा है।
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[Verse 1]
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
तू अल्प ज्ञान
यह ज्ञान स्त्रोत
तू दीपक-ज्योत
यह महाज्योत
यह निर्मल हेतु कटु परिधान
यह मौन रहे
तू कर व्याख्यान
हर श्वास में तेरी ही तलाश
हर धकधक में तेरा ही प्रकाश
[Chorus]
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
तू छाया भी
तू ही सार
फिर हमसे इतना इनकार
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
[Verse 2]
सृष्टि का पलक तो तू है
इसका संहारक तो तू है
तू प्रभाव
तू शक्तिमान
जो सत्य है
बस तू ही पहचान
पर नहीं संबंध इतना सा
तू ही समीप
तू ही दुराशा
सृष्टि भी तेरी पलक है यदि
इसका जो संहारक है
तेरी ही छवि
[Chorus]
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
तू छाया भी
तू ही सार
फिर हमसे इतना इनकार
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
[Bridge]
यदि यह संहारक है इसका
यह भी तेरी संहारक है
तू ही प्रश्न
तू ही उत्तर
तू ही राह
तू ही पथिक प्रखर
[Chorus]
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
तू छाया भी
तू ही सार
फिर हमसे इतना इनकार
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
ये धरा मौ न उपवास करेगी कब तक ।
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक ।
सृष्टि का पालक तो तू है।इसका संहारक तो तू है।।
तू प्रवाह मान तू शक्तिमान जो सत्य है वो तू है।।
पर नहीं सम्बन्ध इतना सा सृष्टि भी तेरी पालक है। यदि तू संहारक है इसका।ये भी तेरी संहारक है।।ये धरा मौ न उपवास करेगी कब तक| तुुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक।।
Desh ki Alan pe; Desh ki shan Pe; dege hum Jan bhi Hindi dindustan pe;
Bulanddiya pukaryi
Kadam mila bharti
Spne sjayege
Satve aasman.
Desh ki San pe ; dish ki shan pe
Aasma pe ye tiranga aaj hum fhrayege ; desh ke dushman sabhi much ki him she khayege
Aankh udake bhi dekhna ho mushkil
Itna chamkila aaj desh hum bnayege
Him mitege aaj for desh keep ssmman pe
dege hum Jan bhi ...........
Sangathan mai hi shakti h hamari vishva Vijay ki abhilasha h hamari
Garv h game hair saskritik phchan pe
dege hum Jan bhi ..........