चीत्कार उठी मानवता आज फिर सडकों पर|
लाशो का अम्बार लगा जब सडकों पर|
कितने घर उजड गये कितने अपनो से विछड गये|
आसुओं का सैलाव वहा जब सडकों पर|
नही बधें है हाथ कुछ कर दिखलाओ तुम|
मक्कारी के आंसु मत बहाओ तुम||
उनको भी दर्द का एहसासहो जाने दो|
मोमबत्ती मत जलाना अब सडकों पर||
चीत्कार उठी मानवता आज फिर सडकों पर-----
मिटने को तैयार हुं मै मिट जाऊगा |
खून के आंसू उनको रुलवाऊगा|
मां तेरे बेटो का आवहान है अब सडकों पर||
चीत्कार उठी मानवता आज फिर सडकों पर-----
No comments:
Post a Comment