कब रुकता है कब थमता है
मृत्यु की आहट का सुनता है
नित निरंतर नूतन बुनता है
समय के कंधों पर हो सवार
उस युग से इस युग के पार
होते जीवन पर वार ही वार
फिर भी पाया है जीवन सत्कार
जीवन है चलता जाता है..........(1)
कहीं क्रंदन है कहीं चित्कार
नवरस की जिसमें बहती धार
मनुज गुणों का संगम है यह
जिसमें बस्ते अनाचार अत्याचार
जीवन है चलता जाता है..........(2)
कहीं महलों की चहल पहल भी
खामोशियों की शांत देहल भी
यही अंत है यही पहल भी
यही झोपड़ी यही महल भी
देख रहा है इसे संसार
जीवन है चलता जाता है......... (3)
कोई काव्य के रस में इसे ढूंढ रहा है
कोई इसे ढूंढ रहा है खजुराहो में
कोई अंतरिक्ष में भटक रहा है इसे पाने को
कोई तक्षण तत्पर है एक पल में मिटाने को
जीवन है चलता जाता है......... (4)
विचारों की जब चलती है आंधी
याद आते नानक मोहम्मद गांधी
जीवन का उपदेश सुनाते
कितने मनीषी जीवन भर जीवन की गाथा गाते
जीवन है चलता जाता है...... (5)
कभी हर्ष कभी कष्ट में नैनो से आंसू बहते हैं
क्या वह सुख दुख का संगम है जिसको जीवन कहते हैं
जीवन है चलता जाता है...... (6)
समय भी जिसके पीछे -पीछे
चुपके-चुपके धीमे-धीमे चल रहा है
वसुंधरा भी जिसे पाल रही है
गा रही है मधुर ममता स्नेहिल लोरी
जीवन है चलता जाता है........ (7)
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