Tuesday, 9 April 2019

देवालय


हृदय को देवालय बनाइये

नये स्वप्न संसार को दिखाइये

आइए, आइए, आइए...

गीत 'मानव भक्ति' के गाइये

हृदय को देवालय बनाइये


ध्येय जो भी जीवन में हो मिला

रह न जाए मन में कोई गिला

फूल बनकर यदि न उपवन में खिला

तो जीवन ये कैसा, बताइये?

कर्म से ही कीर्ति को पाइये

जीवन को फूलों सा सजाइये

प्रकृति का दुल्हन सा श्रृंगार कर

पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं से प्यार कर

छोड़ नफरत, सृजन का विचार कर

जीवन को 'बसंत' सा सजाइये

इस बगिया को पसीने से महकाइये


हृदय को देवालय बनाइये

नये स्वप्न संसार को दिखाइये


न भटकें हम अन्धकार में

न उलझें व्यर्थ के विकार में

रत रहें बस मानव के सत्कार में

नये पदचिह्न अब बनाइये

कोई मनुज उपेक्षित न खड़ा

विश्व धरा पर उपकार हो बड़ा

भंवर में जो भूख के है पड़ा

उन्नति का तट उन्हें दिखाइये


हृदय को देवालय बनाइये...

हृदय को देवालय बनाइये...

​[Verse 5 - Duet]

धर्म, वर्ण, नस्लों में जो भेद है

दुर्ग अब भी ऐसा जो अभेद है

नर नहीं नारायण, यही खेद है

वेद अब 'नर-ऋचाओं' का बनाइये


तर्क पर ही रचा विधान हो

एक विधि हो, उसका ही सम्मान हो

समभाव भी विद्यमान हो

समानता से समाज को सजाइये

हृदय को देवालय बनाइये...


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