हृदय को देवालय बनाइये
नये स्वप्न संसार को दिखाइये
आइए, आइए, आइए...
गीत 'मानव भक्ति' के गाइये
हृदय को देवालय बनाइये
ध्येय जो भी जीवन में हो मिला
रह न जाए मन में कोई गिला
फूल बनकर यदि न उपवन में खिला
तो जीवन ये कैसा, बताइये?
कर्म से ही कीर्ति को पाइये
जीवन को फूलों सा सजाइये
प्रकृति का दुल्हन सा श्रृंगार कर
पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं से प्यार कर
छोड़ नफरत, सृजन का विचार कर
जीवन को 'बसंत' सा सजाइये
इस बगिया को पसीने से महकाइये
हृदय को देवालय बनाइये
नये स्वप्न संसार को दिखाइये
न भटकें हम अन्धकार में
न उलझें व्यर्थ के विकार में
रत रहें बस मानव के सत्कार में
नये पदचिह्न अब बनाइये
कोई मनुज उपेक्षित न खड़ा
विश्व धरा पर उपकार हो बड़ा
भंवर में जो भूख के है पड़ा
उन्नति का तट उन्हें दिखाइये
हृदय को देवालय बनाइये...
हृदय को देवालय बनाइये...
[Verse 5 - Duet]
धर्म, वर्ण, नस्लों में जो भेद है
दुर्ग अब भी ऐसा जो अभेद है
नर नहीं नारायण, यही खेद है
वेद अब 'नर-ऋचाओं' का बनाइये
तर्क पर ही रचा विधान हो
एक विधि हो, उसका ही सम्मान हो
समभाव भी विद्यमान हो
समानता से समाज को सजाइये
हृदय को देवालय बनाइये...
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