प्रभाव शेष है इसका अन्तहीन अन्त तक
सांत्वना कौन किसे कब तक देता रहेगा
अंधेरे छाता है दृश्य भी अदृश्य हो जाता है
सगे से सगा भी अपनो से दूर छिटक जाता है
सम्बन्धो की डोर हाथो से छूट जाती है
पिता की चिता को मुखाअग्नि देने से
पुत्र अपने चिर परिचित कर्त्वय से मुकर जाता है
एक पुत्री अपने पिता की प्रतिक्षा करती है
समझती है करने गये है
चिकित्सा बीमार ईश्वर की
आप जाते है देख कर आपको
मासुस मुस्कराती है और
यही आपको बताती है
कलुसित ह्रदय मनुज नही जानते
जिनके प्रति उनके मन मे क्रूरता का वास है
वही ईश्वर है जो उनकी जिन्दगी को
बचाते है सजाते है संवारते है और
छोड जाते है अपने मासुमों को
नितान्त अकेला इस इस जंगलरुपी समाज में
अपनो के बीच रहकर अपनो से वंचित
मात्र अन्तहीन संवेदनाओ के साथ|
No comments:
Post a Comment