जब बेटी अपने घर जाती है ।
यें जीवन चक अनोखा है
हम खोते है वो पाती है
वो दिल का टूकडा होती हे
वो दिल से कब जा सकती हे
उडने को पर दिये हमने
पो पार समुन्दर जा सकती है
उसके आरमान मेरे सपने थें
वो बन सपना रह जाती है
हम सपनो में ही ढूढ़ते है
पर नजर कहाँ वो आती है
मेरे घर आंगन का गुलशन
वो साथ लेकर जाती है
उन महके फूलो की खुशबू
दूर हवाओ में घुल जाती है
आंखों में खुशी के आंसू हैं
या फिर गम की कोई बदली है
चंद लम्हों में सिमटी - सिमटी
मुझे दुनिया अपनी लगती है
जिस वक्त की बठ
डोली में जाती है
एक दुनिया लुट सी जाती है
बाबुल की आखियाँ क्यो रोये
जब वेटी घर सें जाती है।
No comments:
Post a Comment