Tuesday, 22 April 2025

मेरे ख्याल ही मेरे हैं

मेरे ख्याल ही मेरे हैं इन खयालों मे मुझको रहना है 
वक्त गया है अब जमाने को अलविदा कहना है
इस जहां में हंसी ख्वाबो सजाया मैंने
 जहां भर में गैरों को  अपना बनाया मैंने 
नींद टूटी तो वेदम हकीकत को पाया मैंने
अब हर सितम इसका मुझको सहना है 
वक्त आ गया है..................(1)
शायद यह उम्र का तकादा है 
जो मिला अब तक बहुत ज्यादा है 
जिंदगी पिटा हुआ एक प्यादा है
एक किनारे  पर ही मुझको रहना है  
वक्त आ गया है...,..........(2)
गुमनामी भली है शोहरत से
नफरत भली है तेरी मोहब्बत से
हैसियत मिलती नहीं किसी दौलत से
सिर्फ सेहत का क्या मुझको क्या करना है 
वक्त आ गया है...................(3)

गजल: उम्र का तकादा
​(मुखड़ा / कोरस)
​शायद यह उम्र का तकादा है,
जो मिला अब तक बहुत ज्यादा है।
जिंदगी पिटा हुआ एक प्यादा है,
एक किनारे पर ही मुझको रहना है।
वक्त गया है अब जमाने को अलविदा कहना है।
​शेर - 1
मेरे ख्याल ही मेरे हैं, इन खयालों में मुझको रहना है,

शह और मात का खेल है मुझे कसी धोखे में नहीं रहना है

इस जहां में हंसी ख्वाबों को सजाया मैंने,
जहां भर में गैरों को अपना बनाया मैंने।
[कोरस की ओर वापसी]
शायद यह उम्र का तकादा है...
​[शेर - 2]

भीड़ में चलते रहे ताउम्र हम अकेले ही,
  वो कब अपना था जो साथ में था हमसाया

जमाने भर की तपस साथ है मेरे 

मुझे इसमें ही झुलस्ते रहना है



नींद टूटी तो बेरहम हकीकत को पाया मैंने,

अब हर सितम इसका चुपचाप सहना है।
(कोरस की ओर वापसी)
शायद यह उम्र का तकादा है...
​शेर - 3
गुमनामी भली है अब इस झूठी शोहरत से,
नफरत भली है दिखावे की तेरी मोहब्बत से।
हैसियत मिलती नहीं यहाँ किसी दौलत से,
सिर्फ सेहत का अब मुझको क्या करना है।
(कोरस की ओर वापसी)
शायद यह उम्र का तकादा है...
​शेर - 4 (मक्ता)
जब कलम थके और शब्द भी रुकने लगें,
तब खामोशी ही सबसे ऊँची सदा (आवाज़) है।
मिटा के हस्ती अपनी इस 'सृष्टि' के कण-कण में,
अब शून्य की लहरों में ही मुझको बहना है।
(कोरस की ओर वापसी)
शायद यह उम्र का तकादा है...




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