मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है
मजहबी जुनून में गोली और गोलो से
झूलसते और मरते इंसानों को हमने देखा है
अरे ओ खुद को इंसान समझने वालो
हैवानियत का खेल और कब तक खेलोगे
मिट जाएगा नामो-निशा जमी से तुम्हारा
इंसानों की लाशों से और कब तक खेलोगे
तुम्हारे शहंशाहों को सिमटते
हमने देखा है ।।
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है........(1)
ना छू पाए तुम बुलंदियों को आसमानों की
बस लाशों से खेलते रहे तुम अब तक।
बेगैरत हो अपने मजहब का मजाक बनाया तुमने।
मजहब के नाम पर लाशे बिछाते रहे हो अब तक
चंद सिक्कों की खनक तुम्हें सुनते हमने देखा है
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है
......... (2)
तुम्हारे मजहब ने पिया है लहू तुम्हारा भी
तुम मोहब्बत भला गैरों से करोगे कैसे
इंसानियत से तो तुम्हारा नहीं दूर का रिश्ता
तुम भला इंसानों की हिमायत करोगे कैसे
बस कफन की खैरात बाटते तुम्हें हमने देखा है
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है ...........(3)
बस यही नसीहत है आतंक के शैतानों
बहाना बंद करो लहू अब इंसानों का।
अपनी कौम के गद्दार तुम कहलाओगे
गुमनामी की मौत मरोगे कफन भी ना पाओगे
तुम्हारे आकाओं को गोली से मरते हमने देखा है
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है
.........(4)
तुम्हारा अरमान क्या है सभी को मैंबताता हूं
तुम्हारी असली सूरत इस जमाने को मैं दिखाता हूं
तुम अपने वास्ते चाहते हो जमाने भर की दौलत को
तुम्हें इंसानियत का रास्ता मैं दिखाता हूं
कलम और कलाम दे दो अपने बच्चों के हाथों को
बंदूक उनको सौपते तुमको हम सबने देखा है----5
जन्नत का रास्ता जो है मैं तुम्हें दिखाता हूं
तुम्हारे मजहब में रूहू जन्नत की बसती है
इस्लाम में भाई चारा है जो उसकी हस्ती है
जन्नत की हूरों का सपना तुमने खूब दिखाया है
तुम्हें एक मां के लिए आहे भरते हमने देखा है------6
ये सारी कायनात तो खुदा ने ही बनाई है।
इतना बता दो सबको तुम्हारी खुदा से ही लड़ाई है
इसी जमी पे इंशा की जन्नत और दोजक है।
तुम्हें जन्नत में आग लगाते हुए हमने देखा है।------7
'प्रभात' अब अमन की राह पर चलना ही बेहतर है,
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने,
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है।
'प्रभात' अब अमन की राह पर चलना ही बेहतर है,
मजहब के नाम पर जिंदा लोग जलाए तुमने,
तरसते तुम्हें दाल और रोटी को हमने देखा है।
[Outro]
[End
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