मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक
मैं अकेला ही चले जा रहा था
ना मंजिल मिली ना हमसफर फिर भी होशला रहा
मैं अकेले ही बढ़े जा रहा था
मिले तूफान उनसे भी ना डरा मैं कभी
हर कठिनाई से लड़ता जा रहा था
मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक
मैं अकेला ही चले जा रहा था
मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक
मैं अकेला ही चले जा रहा था
बुलंदियों की चाह में मुड़कर ना देखा कभी
मैं अपने कदमों को आजमा रहा था
दिन भी निकला और रात भी सफर में हुई
बस कदमों की आहट सुनता जा रहा था
मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक
मैं अकेला ही चले जा रहा था
बड़ी मुश्किल से मिलता है दो पहर का आराम
मुझे सबर था मैं खुद पर इतरा रहा था
मुझे यकीन था कि मंजिल भी पास ही होगी
इसी यकीन पे मैं चलता जा रहा था
मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक
मैं अकेला ही चले जा रहा था
मंजिलें अभी बहुत दूर हैं प्रभात मुझसे
मैं तन्हा ही सफर करता जा रहा था
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