Wednesday, 6 May 2026

मैं अकेला ही चले जा रहा था

मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक 
मैं अकेला ही चले जा रहा था

ना मंजिल मिली ना हमसफर फिर भी होशला रहा 
मैं अकेले ही  बढ़े जा रहा था

मिले तूफान उनसे भी ना डरा मैं कभी 
हर कठिनाई से लड़ता जा रहा था 

मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक 
मैं अकेला ही चले जा रहा था

मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक 
मैं अकेला ही चले जा रहा था
 
बुलंदियों की चाह में मुड़कर ना देखा कभी 
मैं अपने कदमों को  आजमा रहा था 

दिन भी निकला और रात भी  सफर में हुई 
बस कदमों की आहट सुनता जा रहा था 

मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक 
मैं अकेला ही चले जा रहा था

बड़ी मुश्किल से मिलता है दो पहर का आराम 
मुझे सबर था मैं खुद पर  इतरा रहा था 

मुझे यकीन था कि मंजिल भी पास ही होगी
इसी यकीन पे मैं चलता जा रहा था

मुझे मंजिल की तलाश थीअब तक 
मैं अकेला ही चले जा रहा था

मंजिलें अभी बहुत दूर हैं प्रभात मुझसे
मैं तन्हा ही सफर करता जा रहा था

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