बचपन की मुझे याद दिलाता है मां का आंचल,
अपनी ममता का एहसास कराता मां का आंचल।
पवन के झोके बन जाता था माॅंं का आंचल।
मेरी उद्दडणता पर जब पढ़ते थे डंडे मझको,
बनकर ढाल बचाता था मुझे माॅंं का आंचल।
जब रातों में नींद नहीं आती थी मुझको,
मधुर मधुर लोरी सुनाता था माॅंं का आंचल।
जब भी बोला माॅं कोई चीज खरीद के लानी है,
पैसों की खनक सुनाता था तब माॅंं का आंचल।
उस आंचल की घनी छांव मैं ढूढ रहा हूॅं,
लुप्त हुआ नहीं दिखता मुझको माॅंं का आंचल।
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