अपनों का अपनापन...
गैरों का बेगानापन...
(ठहराव)
यदि देखना चाहो, तो एक प्रयोग करो।
अपने बगल में एक ओर, किसी 'गैर' को,
तथा दूसरी ओर, किसी 'अपने' को बैठाओ।
(लय में एक तल्खी और सच्चाई)
फर्क क्या है? खुद ही समझ जाओगे।
जब गैरों से तारीफ...
और अपनों से... जली-कटी सुन पाओगे।
(गति थोड़ी बढ़ाते हुए - पीड़ा का प्रवाह)
गैर कुछ पल साथ रहते हैं,
अपनों को दामन में संजो के रखना पड़ता है।
सब कुछ निछावर कर, दामन रिक्त करना पड़ता है।
(आवाज में भारीपन और कंपन)
फिर वही...
फिर वही उस दामन को... तार-तार कर जाते हैं।
(धीमे और गंभीर स्वर में)
बड़े भाग्यशाली होते हैं वो...
जिन्हें वास्तव में 'अपने' मिल जाते हैं।
(इतिहास की गूंज - स्वर बुलंद और प्रभावशाली)
इतिहास में झांकिए,
अपनों ने ही अपनों का लहू बहाया है।
असंख्य अपनों को, स्वर्ग पहुँचाया है।
अपने 99 भाइयों का वध करने वाला सम्राट अशोक... इतिहास में महान कहलाता है,
अपने भाइयों रियाया पर जुल्म करने वाला... औरंगज़ेब क्रूर शासक कहलाता है।
(व्यंग्य और सत्य की गूंज)
आपकी उदारता अपनों पर रंग नहीं दिखाती है।
मगर अपनों की नफरत... सातवें आसमान पर छा जाती है।
(मार्मिक खंड - धीमी और रुआंसी आवाज)
आजकल मां-बाप को भी...
'वृद्धा केयर केंद्र' में रखना पड़ता है।
कुछ मां-बाप यदि घर में रहते हैं,
तो बेटे-बहू क्या कुछ नहीं उन्हें कहते हैं।
(एक टीस के साथ)
जिसने नौ महीने गर्भ में पाला था...
अब वही... उन्हें वृद्धा केंद्र भेजने वाला था।
(आंखें बंद करके, जैसे पूर्वजों का आह्वान कर रहे हों)
स्वर्ग से मेरे पूर्वज मुझे देख कर सोचते होंगे...
"काश! हमने भी ऐसा किया होता...
तो अपनों ने हमें, यूँ लज्जित ना किया होता।"
(परिपक्व संकल्प - स्पष्ट और लयबद्ध उच्चारण)
यूं तो यह सब कहना फजूल है।
आज मेरे दिल का बस एक उसूल है।
मैं अपनों से दामन बचाने लगा हूँ।
और गैरों की राहों में दामन बिछाने लगा हूँ।
बस आपसे तो मैं माफी मांग सकता हूँ।
किंतु नहीं अब... किसी गैर को दुत्कार सकता हूँ।
(दार्शनिक लय - सुरीला और गहरा प्रवाह)
मेरी बहुत सुंदर पंक्तियां मुझे याद आती हैं—
फूलों और कांटों का अस्तित्व साथ रहा है।
फूल तो सुंदर होते हैं, कुरूप बड़े यह कांटे हैं...
अपनी-अपनी किस्मत है...
किसको क्या कुदरत ने बांटे हैं।
(आवाज में एक चेतावनी और सत्य)
हाथ बढ़ते हैं जब फूल की चाहत में...
हाथ बढ़ते हैं जब फूल की चाहत में...
कांटो की दीवार को तो रोकना था।
फूलों की चाहत जब तुमने तुमने की थी तुम्हें
चुभन की वेदना का एहसास भी... ना छोड़ना था।
(द्वंद्व और अंतिम समर्पण - धीमी होती हुई लय)
कैसे छोड़ू मैं अपनों को?
जो मेरे अपने सपने हैं...
कैसे छोड़ू मैं अपनों को?
कैसे जोडू मैं अपनों को?
(जैसे स्वयं से प्रश्न कर रहे हों)
बस यही सोचता रहता हूं...
बस यही सोचता रहता हूं...
वह मेरे सपनों में बसते हैं,
मैं उनके सपनों में बसता हूं।
बस यही सोचता रहता हूं...
काश वह मेरे संग होते,
जीवन के सपने सच होते।
(उपसंहार: 'प्रभात' के नाम की गूंज - अत्यंत मार्मिक)
मैं कभी भूल ना पाऊंगा...
मैं कभी भूल ना पाऊंगा...
जब सांसे अंतिम होगी.. 'प्रभात'..
मैं उन्हें याद भी आऊंगा... 'प्रभात'
मैं जी कर उन्हें भी रुलाऊंगा।
मैं जी भर कर भी उन्हें रुलाऊंगा।
अपनों का अपनापन...
गैरों का बेगानापन...
यदि देखना चाहो, तो एक प्रयोग करो।
अपने बगल में एक ओर, किसी 'गैर' को,
तथा दूसरी ओर, किसी 'अपने' को बैठाओ।
फर्क क्या है? खुद ही समझ जाओगे।
जब गैरों से तारीफ...
और अपनों से जली-कटी सुन पाओगे।
गैर कुछ पल साथ रहते हैं,
अपनों को दामन में संजो के रखना पड़ता है।
सब कुछ निछावर कर, दामन रिक्त करना पड़ता है।
फिर वही...
फिर वही उस दामन को तार-तार कर जाते हैं।
बड़े भाग्यशाली होते हैं वो...
जिन्हें वास्तव में 'अपने' मिल जाते हैं।
इतिहास में झांकिए,
अपनों ने ही अपनों का लहू बहाया है।
असंख्य अपनों को, स्वर्ग पहुँचाया है।
अपने 99 भाइयों का का वध करने वाला सम्राटअशोक
इतिहास में महान कहलाता है,
अपने भाइयों रियाया पर जुल्म करने वाला
औरंगज़ेब क्रूर शासक कहलाता है
आपकी उदारता अपनों पर रंग नहीं दिखाती है।
मगर अपनों की नफरत, सातवें आसमान पर छा जाती है।
आजकल मां-बाप को भी...
'वृद्धा केयर केंद्र' में रखना पड़ता है।
कुछ मां-बाप यदि घर में रहते हैं,
तो बेटे-बहू क्या कुछ नहीं उन्हें कहते हैं।
जिसने नौ महीने गर्भ में पाला था...
अब वही उन्हें वृद्धा केंद्र भेजने वाला था।
स्वर्ग से मेरे पूर्वज मुझे देख कर सोचते होंगे...
"काश! हमने भी ऐसा किया होता...
तो अपनों ने हमें, यूँ लज्जित ना किया होता।"
यूं तो यह सब कहना फजूल है।
आज मेरे दिल का बस एक उसूल है।
मैं अपनों से दामन बचाने लगा हूँ।
और गैरों की राहों में दामन बिछाने लगा हूँ।
बस आपसे तो मैं माफी मांग सकता हूँ।
किंतु नहीं अब किसी गैर को दुत्कार सकता हूँ।
मेरी बहुत सुंदर पंक्तियां मुझे याद आती हैं
फूलों और कांटों का अस्तित्व साथ रहा है।
फूल तो सुंदर होते हैं, कुरूप बड़े यह कांटे हैं...
अपनी-अपनी किस्मत है...
किसको क्या कुदरत ने बांटे हैं।
हाथ बढ़ाते हैं जब फूल तोड़ने की चाहत में
हाथ बढ़ते हैं जब फूल की चाहत में
कांटो की दीवार को तो रोकना ही था
फूलों की चाहत जब तुमने नहीं छोड़ी तब तुम्हें
चुभन की वेदना का एहसास भी ना छोड़ना था
कैसे छोड़ू मैं अपनों को?
जो मेरे अपने सपने हैं...
कैसे छोड़ू मैं अपनों को?
कैसे जोडू मैं अपनों को?
बस यही सोचता रहता हूं...
बस यही सोचता रहता हूं...
वह मेरे सपनों में बसते हैं,
मैं उनके सपनों में बसता हूं।
बस यही सोचता रहता हूं...
काश वह मेरे संग होते,
जीवन के सपने सच होते।
मैं कभी भूल ना पाऊंगा...
मैं कभी भूल ना पाऊंगा...
जब सांसे अंतिम होगी. 'प्रभात'..
मैं उन्हें याद भी आऊंगा... 'प्रभात'
मैं जी कर उन्हें भी रुलाऊंगा।
मैं जी भर कर भी उन्हें रुलाऊंगा
No comments:
Post a Comment