Saturday, 24 January 2026

मुझको हवाओं में रहने का शौक था

मुझको हवाओं में रहने का शौक था,
पत्थरों के टीले बनाता चला गया।।
हंसने की चाहत थी रोना पड़ा मगर।,
आंसूओ के समुन्दर बनाता चला गया।।
मैं सोचता था कि मुझसे होती नहीं खता,
फिजाओं को चुपचाप रुलाता चला गया।
हमसफर जो थे मेरे वो आगे निकल गए, कदमों से कदम बस मिलाता चला गया।।
गाती नहीं अब बुलबुल मेरे चमन में,
उल्लूओ का शोर बढ़ाता चला गया।।
फिक्रमंद हूॅं मगर कुछ कर नहीं सकता, 
अपना घौसला खुद मिटाता चला गया ।। 
खुद के ही सवालों सवालों में घिरा रहा मगर,
हर हकीकत से नजरें बचाता चला गया
बाटता मरहम मसीहा बनकर जो दुनिया के वास्ते,
वही अपने ही हाथों से घाव लगाता चला गया।
ख़ामोशिया को समझा था सुकून-ए- दिल का सबब,
इक शोर बन गया रिश्तों को रुलाता चला गया।
इल्ज़ाम दूसरों पे लगाना था आसान मगर,
मैं अपनी निगाहों को बचाता चला गया।
अपना आशियाना सजाने की चाह में, 
बहार को पतझर सा बनाता चला गया।।
नेकियों का शहर में,  'ऐ प्रभात' मैं किरदार बन गया,
अपने रूह-ए-खयालात गिराता चला गया।










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