Saturday, 24 January 2026

नफरतों की आंधियां

देखता हूं मैं जिधर एक बवंडर है उधर,
उठ रही है हर तरफ नफरतों की आंधियां।
बस गोलियों का शोर था,थी लाशे बिछी हुई,
बड़ी सुनसान थी हसीन सपनों की वादियां।
वो देखने में तो इंसान थे मगर दिल से पत्थर ।
जिसने गुलिस्ता में यह जलजला सा
ला दिया।।
शहर की थी चाह और कुछ मौज मस्ती का शौक था।
हंस के निकले थे हम उन दंरिदो ने क्यों  रुला दिया ।।
जुल्म कैसा किया शैतान ने मजहब के नाम पर, 
मजहब से अपने इंसानियत को ही मिटा दिया।

होता अगर खुदा करीब तो मैं पूछता उससे ये।
वह इंसान कौन है जिसने इंसानियत का, लहू वहा दिया।
जहां हूर ही हूर है और ख्याली में ऐश है
ऐसा अनोखा फलसफा ये किसने बना दिया
मैरे देखते ही देखते सब खाक बनकर रह गया।
'प्रभात' बहसी हैबानो ने बस्ती का हर घर जला दिया।।

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