चाहे जितनी चाहो भड़कालो।
रोती सिमटती सांसों को, तुम चाहो तो
बचा लो।
आग से आग बुझेगी नहीं .....(1)
मानवता की सिसकती सांसों में
तुम खोज रहे हो खुशहाली।
शोलों के दहकते गुब्बारो में
तुम ढूंढ रहे हो फूलों की डाली।।
तुम भी तो खुद भी झुलसोगे।
उजले तन के मन के कालो.....
आग से आग बुझेगी नहीं........(2)
जब बीतेगी कयामत की राते
तब नींद तुम्हें कैसे आएगी
खुद की तुम्हारी परछाई
तुमको भी बहुत डरायेगी
तुम सो ना सकोगे रातों में।
नफरत की लोरी गाने वालों
आग से आग बुझेगी नहीं.....(3)
इंसानियत की राहो में
इंसान बनो और साथ चलो
इस तरक्की और खुशहाली से
ना दूसरो को जलाओ ना खुद जलो
तुम खुद अपने घर जलाते हो
तुम्हें कौन है क्या समझा पाएगा
खुद समझोगे तुम यह बात तभी
तुम्हारा हर सहारा छिन जाएगा
नसीब तुम्हारा बरूद बन ही गया,
खुद तुम झूलसते रहे हो अंगारों में,
तुमने यह हिम्मत कहां से पाई ह
तुम लांशे देख रहे पड़ी हुई कतारों में
यमदूत बन गए क्यों आज तुम
शांति शांति चिल्लाने वालों
प्रभात तो बस यही कहता है
आग से आग बुझेगी नहीं.....(4)
No comments:
Post a Comment