मेरे अपने मेरी नजरों से बहुत दूर हुए ।
उनकी परछाईया भी छू ना सके
इतने हम मजबूर हुए।
वो सहारा है मगर अब सहारा ना हुए।
हाय ये जज्बात भी अब हमारे ना हुए।
सपना उनका देखा था मगर वो सपने में मजबूर हुएl
मेरे अपने मेरी नजरों..........(1)
याद है मुझको मेरे आंगन की वो रातें। सब से मिलकर किया करते थे दिल की बातें।।
सब कुछ बदला बदले हुए से दस्तूर हुए
मेरे अपने मेरी नजरों से..........(2)
उजड़ा उजड़ा सा लगता है वो मेरा चमन।
दिल में रह गई है याद बनकर कोई चुभन।
जगमगाते हुए फानुस भी चकनाचूर हुए
मेरे अपने मेरी नजरों से.........(3)[Intro]
(Painful Sarangi and slow Tabla beats)
[Chorus - Emotional]
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए,
उनकी परछाइयाँ भी छू न सकें, इतने हम मजबूर हुए...
इतने हम मजबूर हुए...
[Verse 1]
वो सहारा थे मगर, अब सहारा न रहे,
हाय! ये जज़्बात भी अब हमारे न रहे।
सपना उनका देखा था, मगर वो सपने भी मजबूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए।
[Verse 2]
याद हैं मुझको मेरे आँगन की वो रातें,
सब से मिलकर किया करते थे दिल की बातें।
सब कुछ बदला, बदले हुए से अब दस्तूर हुए,
अपनों के ही शहर में हम जैसे मजबूर हुए।
[Verse 3]
उजड़ा-उजड़ा सा लगता है अब वो मेरा चमन,
दिल में रह गई है याद बनकर बस एक चुभन।
जगमगाते हुए वो फानूस भी अब बेनूर हुए,
वक़्त के हाथों हम इस कदर चूर-चूर हुए।
वक्त की गर्द ने चेहरों को धुंधला कर दिया,
पास रहकर भी दिलों में फासला भर दिया।
ज़ख्म दिल के दिखा न सके, इतने हम मजबूर हुए...
लिखते-लिखते थक गई है अब 'प्रभात' की कलम,
पर कम न हुआ आँखों से इन यादों का नम।
किस्मत के लिखे से हम भी आज मजबूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(मुखड़ा)
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए,
उनकी परछाइयाँ भी छू न सकें, इतने हम मजबूर हुए।
वो सहारा थे मगर, अब सहारा न रहे,
हाय! ये जज़्बात भी अब हमारे न रहे।
सपना उनका देखा था, मगर वो सपने भी चकनाचूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(अंतरा 1)
याद हैं मुझको मेरे आँगन की वो रातें,
सब से मिलकर किया करते थे दिल की बातें।
सब कुछ बदला, बदले हुए से अब दस्तूर हुए,
अपनों के ही शहर में हम जैसे मज़दूर हुए।
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(अंतरा 2)
उजड़ा-उजड़ा सा लगता है अब वो मेरा चमन,
दिल में रह गई है याद बनकर बस एक चुभन।
जगमगाते हुए वो फानूस भी अब बेनूर हुए,
वक़्त के हाथों हम इस कदर चूर-चूर हुए।
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(अंतरा 3)
वक्त की गर्द ने चेहरों को धुंधला कर दिया,
पास रहकर भी दिलों में फासला भर दिया।
जो कभी थे नज़दीक, अब वो कोसों दूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(अंतरा 4)
अब परिंदे भी नहीं आते मेरे उस मुंडेर पर,
एक सन्नाटा सा बिछा है घर के हर उस ज़ेर पर।
रौशनी के सब दीये बुझ कर अब बेनूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(अंतरा 5)
महफिलों में हम भी अब हँस कर मिला करते हैं सबसे,
पर जुदा होने का ग़म हम सह रहे हैं जाने कब से।
ज़ख्म दिल के दिखा न सके, इतने हम मग़रूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
(मकता)
लिखते-लिखते थक गई है अब 'प्रभात' की कलम,
पर कम न हुआ आँखों से इन यादों का नम।
किस्मत के लिखे से हम भी आज मजबूर हुए,
मेरे अपने मेरी नज़रों से बहुत दूर हुए...
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