“ये ग़ज़ल मोहब्बत की शिकायत नहीं, उसकी सच्चाई का सामना है।
जहाँ इंतज़ार से आगे बढ़कर, रू-ब-रू होकर एक साफ़ फ़ैसला माँगा गया है।”
दिल से निकाल दे मुझे या दिल में जगह दे,
मैं भी भुला दूँ तुझे—इतनी सी वजह दे।
सताती है मुझे रोज बीच की दूरियां
मुझे दिल से लगा या दूर कर कोई फैसला तो ले
मैं बे-सवाल रहू , तू बे-ख़याल हो,
इस ख़ामोशी की जगह कुछ तो जवाब दे।
ठहरे हुए लम्हों में अब घुटने लगी है सांस
तुझे मेरी तन्हाइयों का वास्ता कोई रास्ता तो दे
दिल से निकाल दे मुझे या दिल में जगह दे,
मैं याद भी न करूँ तुझे, कोई तो वजह तो दे
मक़ता:
एक उम्र काट दी है तेरे इंतज़ार में,
प्रभात अब रू-ब-रू हो—झूठी तसल्ली न दे।
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