बस मुस्कुरा के एक बार कह दो तुम्हें रुला रहा ह
मतला
मैं तुम्हें छोड़कर इस शहर से जा रहा हूँ,
बस मुस्कुरा के कह दो कि तुम्हें रुला रहा हूँ।
शेर 1
वो मोड़, वो दरिचा, वो गलियाँ तड़प उठेंगी,
मैं साथ अपने यादों का जहाँ ले जा रहा हूँ।
शेर 2
जो बुझ गई थी शम्अ, उसे फिर हवा न देना,
मैं राख के ढेरों में चिराग़ जला रहा हूँ।
शेर 3
मिलेगी न अब तुम्हें मेरी वफ़ा की आहटें भी,
मैं खुद को अपनी हस्ती से ही मिटा रहा हूँ।
शेर 4
तुम्हें बोझ न बना दे कभी मेरा ये तसव्वुर,
मैं यादों के हसीं पिंजरे से तुम्हें छुड़ा रहा हूँ।
शेर 5
सफ़र ये उम्र भर का है, मगर तन्हा कटेगा,
मैं खुद को खुद ही मंज़िल का पता बता रहा हूँ।
मक्ता
उदासियों की धूप में न जलना ऐ 'प्रभात',
मैं अश्क पी के आँखों में घटा सजा रहा हूँ।
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