Thursday, 5 March 2026

ओ आली ये प्रेम की पीड़ा

ओ आली ये प्रेम की पीड़ा 
मुझसे सही ना जाए 
प्रीतम मुझको विस्मृत कर बैठे 
तभी जाकर अब तक ना आए 
ओ आली ये प्रेम की पीड़ा 
मुझसे सही ना जाए
शरद ऋतु में शीत बढी है 
तनमन में कंपन बड़ी है 
फिर भी  अगन लगी है
मेरे पिया जाने कब आए 

यह कि अगन में बुझाए
ओ आली ये प्रेम की पीड़ा 
मुझसे सही ना जाए 
प्रीतम मुझको विस्मृत कर बैठे 
तभी जाकर अब तक ना आए 
बीत गई शरद ऋतु भी
मोरे पिया ना आए अब भी
सूख रही उपवन में कालिया
फूल पहले से ही है मुरझाए 
सारंग भी जाने कहां जा बैठे 
कोयल कूक रही उपवन में 
 विरह  गीत सुनाए, प्रीतम की याद सताए 
ओ आली ये प्रेम की पीड़ा 
मुझसे सही ना जाए 
प्रीतम मुझको विस्मृत कर बैठे 
तभी जाकर अब तक ना आए 

ग्रीष्म ऋतु आई शूल चुभावे,

तन का कष्ट बढाए 

पिया भी मोरे संघ नहीं 

घावो पर मरहम कौन लगाए

कासे कहूँ मैं व्यथा हृदय की, 

कौन जो धीर बंधाए

ओ आली ये प्रेम की पीड़ा 
मुझसे सही ना जाए 
प्रीतम मुझको विस्मृत कर बैठे 
तभी जाकर अब तक ना आए 

नैन बिछाए बाट निहारूँ, 

पल-पल युग सा बीते
हार गयी मैंं सब कुछ आली 

पिया  शुद्ध बुद्ध तक जीते
जीवन बन गया बाती दीपक की

तेल बिना पल-पल बुझता जाए

ओ आली ये प्रेम की पीड़ा 
मुझसे सही ना जाए 
प्रीतम मुझको विस्मृत कर बैठे 
तभी जाकर अब तक ना आए 

तिमिर बढा मेरे जीवन में

उजियारा कौन दखाएं

देखूँगी मैं जब नैयनों से, 

' तब नैनों में ज्योति आए 

मुंडेर पर बैठा काक टेरता

काश पिया का कोई संदेशा लाए

 तब मिटेगी ये पीर पुरानी, 

मेरे  पिया जब घर आए










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