एक नेक इंसान ने खुदा से ये पूछा, ऐ खुदा मुझको इतना बता दे जहाँ में और क्या-क्या होगा।
कब मिटेगी ये दुनियादारी, दिन क़यामत का कौन सा होगा?.
खुदा कहने लगा फक्र है मुझको ऐ बंदे तुझ पे, तूने पूछा जो सवाल मुझसे।
अब जवाब तू अपना सुन ले, दिन क़यामत का तू याद कर ले।
शान इंसान की रखी है अल्लाह ने, मगर उसने खुद अपनी आबरू लुटाई।
दौलत एक ग़म है जो बाँट दी जहाँ में, बख्श कर जिले मोहब्बत, जहाँ में रूह भी बख्शी
सच्चाई समझ मेरे बंदे, तुझ पर क़यामत आई,
जब तूने कर्म छोड़े और सिर्फ दौलत कमाई।
इबादत में भी ये तो ढूँढे मुनाफ़ा, खुदा को भी ठगने की फितरत है पाई।
ज़ुबां पे है कलमा, बग़ल में है खंजर, ये कैसी अदाकारी तूने दिखाई?
आखिर तो खुदा के दर पर ही होनी है सुनवाई,
वहाँ न चलेगी तेरी ये दौलत, न चतुराई।
सब कुछ यहीं छोड़ के जाना है मुसाफिर, खाली ही हाथ आया था, और खाली है विदाई।
पर भाग न फर्ज़ों से, न बन झूठा वैरागी,
समाज में रह कर ही कर, तू कर्मों की कमाई।
कांटों भरा रस्ता है, मगर हक़ पे डटे रह,
बस नेक अमल से ही मिलेगी तुझे रिहाई।
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