Saturday, 7 March 2026

जागे की निद्रा से सोकर

सदा वाहिनी नदियां सुख रही 
किस और चली जल की धार 
पल पल घटता जाता है 
मानव जीवन का आधार 

भीषण गर्मी जब आती है 
त्राहि-त्राहि- सी मच जाती है
वर्षा के मेंघो की धारा 
हर तरफ उत्पात मचाती है 

जल धारण कर रूप विकराल 
बन जाता है जीवन का काल
कालिदास बना मनुज
काट रहा वृक्षों की डाल 

खेती डूबी डूब गांव रहे 
सिर पर छत की ना छांव रहे 
 देखा जिधर जल ही जल 
जल में हर क्षण पांव रहे 

कैसा अनुपम विरोधाभास 
घोर संकट का होता आभास 
कभी सुनामी सी लहरे घर में होती 
कभी पीने को पानी  ना होता पास 

 तटबंध हो गए नि:सहाय
व्यर्थ हो रहे सब उपाय 
प्रकृति का तांडव जब होता है 
बस मुख से निकले हाय-हाय

संरक्षण अब जल का हो 
आवश्यक काज ना कल का हो 
कल तो विप्लव को आना है 
अभाव आज ना जल का हो 

जल की धारा किस ओर चले 
विज्ञान का भी क्या कोई जोर चले 
इच्छा से खेतों में जाए वो
या समुद्र की ओर मुड़ जाए वो

समृद्धि के सपने साकार बने 
सचेत अगर सरकार बने 
गांव  पूर नगर ना  उजड़ेंगे 
कितना बरसे चाहे मेघ घने


पछताएंगे मनुष्य जल को खोकर 
जागे की निद्रा से सोकर 
तभी जीवन आधार संभव होगा 
वृक्ष काटे अगर वृक्ष बीज बोकर

No comments:

Post a Comment