[भटकाव और पीड़ा]
जंगल-जंगल भटका मानव, अनजान हुआ है जीवन से,
कम्पित है, रक्त-रंजित है, थका नहीं फिर भी मन से।
वह क्या जाने, क्यों पहचाने, ऐ मानव तेरी पीड़ा को?
है विलीन जिसमें जीवन तेरा, देखे कैसे इस कीड़ा को?
[द्वंद्व और आधुनिकता]
है द्वंद्व अब नया शुरू हुआ, टक्कर होगी चट्टानों में,
अट्टहास हुआ था शब्दों का, अब जान पड़ी तलवारों में।
प्राचीन कहां यह धरा रही, जब इसका नवीन श्रृंगार हुआ,
भौतिक है जब अबका मानव, कहां आत्म-साक्षात्कार हुआ?
[खोज और क्रांति]
तू ढूंढ रहा है शांति को, एक खामोश भ्रांति को,
या ढूंढ रहा है भू पर तू, एक नव क्रांति को?
कर प्रयास शायद मिल जाए, साकार स्वपन एक हो जाए,
संदेह है मुझे यह, कि तू स्वयं कहीं खो न जाए।
[संकल्प और पुनरुद्धार]
दुर्गम है पथ पर जाना होगा, भागीरथ बन दिखलाना होगा,
खो गई मानवता की गंगा, एक बार उसे फिर लाना होगा।
इस मानवता की गंगा में, स्नान करेगा जब मानव,
स्वयं शीतल बन जाएगा, स्वच्छ बनेगा तब मानव।
[उपसंहार: विश्व शांति]
जब मानव-मानव को जानेगा, तब मानव को पहचानेगा,
"विश्व शांति का उद्धार करूंगा", यह सुंदर प्रण वह ठानेगा।
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