फिर मेरे शहर में एक आज का शोला भड़का
फिर मेरे शहर में लाशों का एक मेला भड़का
कोई रंग न था जो इस रंग को भी रंग करता
इस कदर था यह रंग कुछ भड़का-भड़का
फिर मेरे शहर में एक आज का शोला भड़का......
एक गुनाह है यह खुशियों में मातम होता है
रोते हुए एक मां कहती है ये था मेरा लड़का
वह कौन दरिंदा था जिसने जाल तारो का बिछाया ऐसा
जिसके करंट ने दिया हर दिल को एक झटका
फिर मेरे शहर में आज का शोला भड़का
सिर्फ फतेह की कात है और नोटों का पुलन्दा है
सरकारी महकमा अभी तक है वहीं अटका
फिर मेरे शहर में मौत का शोला भड़का
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