[शुरुआती चार पंक्तियाँ - बतौर शेर/शायरी]
खुद तो इश्क़ करते हैं, इश्क़ वालों से जलते हैं,
इश्क़ को बदनाम करते हैं, इश्क़ से भी डरते हैं।
इश्क़ में भी हैसियत देखते हैं ये लोग,
और महफ़िल में सरेआम इश्क़ करते हैं!
[गीत का मुख्य भाग - गायन शैली में]
इश्क़ वालों से जलना छोड़ दो,
वरना लोगों तुम इश्क़ करना छोड़ दो।
इश्क़ वालों से जलना छोड़ दो,
वरना लोगों तुम इश्क़ करना छोड़ दो।
चाहत का मज़ा लेना चाहते हैं,
दूसरों की चाहत पे पत्थर मारते हैं।
झूमते हैं खूब सुबह-शाम गलियों में,
इश्क़ से जलने वाले घूमते हैं खूब।
अपने सनम के महबूब बन जाते हैं,
दूसरों को आकर आँखें दिखाते हैं खूब।
इनकी में नज़र आशिक का इश्क़ करना गुनाह,
खुद अपनी सनम की बाहों में लेते पनाह।
अपने सनम पर तुम मरना छोड़ दो,
इश्क़ है गुनाह तो इश्क़ करना छोड़ दो।
इनकी मोहब्बत तो करेगी मज़ा,
हमारी मोहब्बत को मिलेगी सज़ा।
ये मोहब्बत की महफ़िल सजाएँगे,
हम मोहब्बत में पत्थर खाएँगे।
यह महफ़िलों में हँसेंगे-हँसाएँगे,
और हमें लात-घूँसे खिलाएँगे।
मोहब्बत से इतनी नफरत है तुमको,
तड़पा-तड़पा के मार डालोगे हमको।
मोहब्बत की दुनिया में लगाना छोड़ दो,
दुनिया न जाने क्यों मोहब्बत को देती सज़ा है।
उनकी मोहब्बत मोहब्बत है, हमारी मोहब्बत एक सज़ा है!
चुपके-चुपके मोहब्बत करते हैं ये,
मौज-मस्ती, सैर-सपाटा करते हैं ये।
हम अपनी मोहब्बत छुपाते नहीं,
मोहब्बत के दुश्मनो तुम भी अपनी मोहब्बत छुपाना छोड़ दो।
मोहब्बत से इतनी नफरत है तो,
ऐ लोगों तुम आशिक बनना छोड़ दो!
हम इश्क करते हैं गुनाह नहीं करते
तुम्हारी किसी सजा से हम नहीं डरते
देखेंगे कितना हमारे दरमियां फासला
है
हमें आपके दरिया से गुजरने का हौसला है
मोहब्ब्त को दुनिया में झुकना नहीं देंगे हम
सच्ची मोहब्बत को मिटाने नहीं देंगे हम
एक बार नहीं सौ बार हम कहेंगे
जब तक जिएंगे मोहब्बत करेंगे
हमारी मोहब्बत को आजमाना छोड़ दो
इश्क़ वालों से जलना छोड़ दो,
वरना लोगों तुम इश्क़ करना छोड़
No comments:
Post a Comment