मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ,
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ।
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ,
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ।।
(1)
मय और मयकशी बन गई बेबसी थी,
मय और मयकशी बन गई बेबसी थी।
कि दस्तूर वफा के निभाने लगा हूँ,
कि दस्तूर वफा के निभाने लगा हूँ।।
(2)
मयकश तो बहुत हैं मैं अकेला नहीं हूँ,
मयकश तो बहुत हैं मैं अकेला नहीं हूँ।
मैं ही अब सबकी नज़रों में आने लगा हूँ,
मैं ही अब सबकी नज़रों में आने लगा हूँ।।
(मुखड़ा - दोहराव)
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ,
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ।
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ,
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ।।
(3)
शोर बढ़ गया है महफ़िलों में इस कदर,
शोर बढ़ गया है महफ़िलों में इस कदर।
कि महफ़िलों से अब घबराने लगा हूँ,
कि महफ़िलों से अब घबराने लगा हूँ।।
(4)
हँसती है दिल के ज़ख्मों पे बेदर्द ये दुनिया,
हँसती है दिल के ज़ख्मों पे बेदर्द ये दुनिया।
मैं अपनी हँसी आँसुओं में डुबोने लगा हूँ,
मैं अपनी हँसी आँसुओं में डुबोने लगा हूँ।।
(मुखड़ा - दोहराव)
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ,
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ।
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ,
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ।।
(5)
साँसों पे बोझ सी लगती हैं यादें तेरी,
साँसों पे बोझ सी लगती हैं यादें तेरी।
दिलो-दिमाग से तेरी यादें मिटाने लगा हूँ,
दिलो-दिमाग से तेरी यादें मिटाने लगा हूँ।।
(6)
यक़ीन अब नहीं है मोहब्बत का मुझको,
यक़ीन अब नहीं है मोहब्बत का मुझको।
मैं नफ़रत की गलियों में जाने लगा हूँ,
मैं नफ़रत की गलियों में जाने लगा हूँ।।
(मुखड़ा - दोहराव)
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ,
मैं साक़ी तेरे पास आने से घबराने लगा हूँ।
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ,
मुझे कुछ ना कहना मैं लड़खड़ाने लगा हूँ।।
(7)
महबूब की गलियों को भी मैं भूल जाऊँ,
महबूब की गलियों को भी मैं भूल जाऊँ।
इसी आरज़ू से तेरे दर पर आने लगा हूँ,
इसी आरज़ू से तेरे दर पर आने लगा हूँ।।
(मक़्ता - अंतिम शेर)
'प्रभात' एक पैगाम अब तुझको दे रहा हूँ,
'प्रभात' एक पैगाम अब तुझको दे रहा हूँ।
मैं बेबस हूँ, तुझसे नज़दीकियाँ बढ़ाने लगा हूँ,
मैं बेबस हूँ, तुझसे नज़दीकियाँ बढ़ाने लगा हूँ।।
No comments:
Post a Comment