यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक? तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक? तू अल्प ज्ञान ये ज्ञान स्रोत, तू दीपक ज्योत ये महा ज्योत।। ये निर्मल है तो कटु परिधान, ये मौन रहे तू करे व्याख्यान।
यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक
तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक
सृष्टि का पालक तो तू है इसका संहारक भी तू है। तू प्रभावमान तू शक्तिमान,
जो सत्य है वह तू है
पर नहीं संबंध इतना सा। सृष्टि भी तेरी पालक है,
यदि तू संहारक है इसका, यह भी तेरी संहारक है।
युग युग की महिमा का ज्ञान
करना भी नहीं इतनाआसान
सत्य की खोज का पथिक हूं मैं
की निरंतर सत्य की खोज में निकलता हूं मैं
कैसे खोजु कैसे जानू शाश्वत सत्य है क्या इस महान प्रकृति की गोद में मेरा अस्तित्व है क्या
एक तृण मात्र अस्तित्व मेरा
प्रभु चरणों में नित्य वास मेरा
फिर क्या जाना और क्यों आना
जब उद्गम स्रोत ही है वह मेरा
मैं खुद को सर्वशक्ति समझता हूं
यह भ्रम मात्र ही है मेरा
ब्रह्म में निवास है मेरा
जगपति के चरणों से मेरा उद्गम
मैं कब पृथक हूं उससे
वह महा ज्योत है और मैं हूं ज्योत
पर कुछ तो निश्चित मुझ में है उसका
विज्ञान भले ही बिसरा दे उसको
यह ज्ञान विज्ञान सब है उसका
सब ज्ञानो का वही स्रोत है
वही सब नाच नचाता है
वही करण वही करता है
वह हर क्षण रूप बदलता है
मैं मनुष्य को ईश्वर बोल पाया
मैं शब्द अपने तोल पाया
क्या अब भी भ्रमित हू
अपने शब्दों से क्या भेद पाया
निसंदेह तर्क विचित्र सा है
अहंकार में मानव दानव है
फिर क्यों ईश्वर मैं बोलता हूं
एक नूतन दर्शन गूंथता हूं
परमब्रह्म की ही छाया में
परमब्रह्म को ही ढूढता हूं
पूर्ण माया के साथ
मनुज काया में
ईश्वर अंश समाया है
ईश्वर की जो महिमा है
जिसे गीता ने भी गाया है
आत्मा इस नश्वर काया में ही रहती है
जब तक दया करना प्रेम भाव में बहती है
तब तक मनुजता से उसका नाता है
और जब तक मनुज में मनुजता है
वह इस जगत का शाश्वत विधाता है
जो विकारों के वशीभूत है वह दानव है
जो विकारों से रहित है वह मानव है
जब तक सामूहिकता है समाज है
मानव विधाता कल भी था आज है
सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च कष्ट है प्रकृति
जिसकी मात्रा मानव है एक कृति
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