Monday, 2 February 2026

अदाओं के बिठाकर आप पहरेदार बैठे हैं

अदाओं के बिठा कर
आप पहरेदार बैठे हैं,
कब तक  बचेंगे आप हुस्न -ए-ढाल से अपनी।

इन झुकी झुकी सी पलको पे शर्मो हया का इक पर्दा है,
दे रही है सिकस्त मुझे हर चाल से अपनी।

अदाओं के बिठा कर
आप पहरेदार बैठे हैं,
कब तक बचेगे आप हुस्न -ए-ढाल से अपनी।

 यादों का एक कारवां सा  मेरी नजरों पे छा गया, 
इतना कहर सा ढा दिया उसने निगाहे बेमिसाल से अपनी।

अदाओं के बिठा कर
आप पहरेदार बैठे हैं,
कब तक बचेंगे आप हुस्न -ए-ढाल से अपनी।

हुस्न की महफिल है नशीला नशीला सा शमा और जगमगाहट है,
हसीन जलवे  लुटा रहा है मेरा कातिल चाल से अपनी।  

अदाओं के बिठा कर
 आप पहरेदार बैठे हैं,
कब तक बचेंगे आप हुस्न -ए-ढाल से अपनी।

 वो अपना बनाएगा या छोड़ देगा दीवाना बनाकर, 
क्या मिलेगा हमें मोहब्बतें दास्तान से अपनी।

अदाओं के बिठा कर
आप पहरेदार बैठे हैं,
कब तक बचेंगे आप हुस्न -ए-ढाल से अपनी। 
उनकी नजरों में मेरा अश्क भी अब न उभरता होगा
हम खुद भी जिम्मेवार इस हाल के अपनी

अदाओं के बिठा कर
आप पहरेदार बैठे हैं........

तुझे भी हर हाल में अपना बना कर 'प्रभात' मानेगा,
ये सोचना भी मत कि बच पाएगा ख्यालो की खाल से अपनी। 

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