Saturday, 28 February 2026

सन्नाटा

मेरे मन के एक कोने का एकांत

मेरे मन के दूसरे कोने में बैठे 
कोलाहल से कर रहा था 
वार्तालाप बड़ी तलीनता से 
समझा रहा था कोलाहल को 
अरे भाई क्यों अशांति फैलाते हो 
हम दोनों का एक ही घर है 
कृपया यहां रहो शालीनता से 
मनका कोलाहल खिन्नता से 
झुंझलाता हुआ बोला
मिस्टर  एकांत तुमने ही तो 
मेरी महफिल में जहर भोला घोला
तुम खामोशहो किंतु 
बड़बड़ाते हो 
क्यों मुझे इतना
 त्रस्त करते हो
भाई तुम भी अगर मेरी तरह बन जाओ 
ये मन उल्लास से भर जाएगा 
मानोगे मेरी बात 
तुम्हें भी बड़ा मजा आएगा 
मेरे मन के एकांत ने 
एक तिरछी नजर से 
कोलाहल को देखा 
बोला क्या तुमने नहींअच्छी 
मेरी भाग्य रेखा 
उसमें लिखा है 
मैं और तुम 
दोनों स्वभाव से भिन्न हैं 
एक चहल पहल से 
दूसरा खामोशीसे खिन्न है 
इसलिए इस मन को भी 
दो भागों में बाटा है 
तुम्हारे कोने में चहल पहल है
मेरे कोने में सन्नाटा है

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