मेरे मन के एक कोने का एकांत
मेरे मन के दूसरे कोने में बैठे
कोलाहल से कर रहा था
वार्तालाप बड़ी तलीनता से
समझा रहा था कोलाहल को
अरे भाई क्यों अशांति फैलाते हो
हम दोनों का एक ही घर है
कृपया यहां रहो शालीनता से
मनका कोलाहल खिन्नता से
झुंझलाता हुआ बोला
मिस्टर एकांत तुमने ही तो
मेरी महफिल में जहर भोला घोला
तुम खामोशहो किंतु
बड़बड़ाते हो
क्यों मुझे इतना
त्रस्त करते हो
भाई तुम भी अगर मेरी तरह बन जाओ
ये मन उल्लास से भर जाएगा
मानोगे मेरी बात
तुम्हें भी बड़ा मजा आएगा
मेरे मन के एकांत ने
एक तिरछी नजर से
कोलाहल को देखा
बोला क्या तुमने नहींअच्छी
मेरी भाग्य रेखा
उसमें लिखा है
मैं और तुम
दोनों स्वभाव से भिन्न हैं
एक चहल पहल से
दूसरा खामोशीसे खिन्न है
इसलिए इस मन को भी
दो भागों में बाटा है
तुम्हारे कोने में चहल पहल है
मेरे कोने में सन्नाटा है
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