मतला:
हालात बड़े थे उलझे उलझे, हम सुलझाते तो कैसे सुलझाते।
हम उलझ गए खुद में ही, इन हालातों को सुलझाते-सुलझाते।
शेर:
इक धोखा दिया खुद अपने को, सच मान लिया इक सपने को।
आंखों से पानी छलक गया, जब तक ये होंठ मुस्कुराते।
शेर:
रुकते भी तो कैसे रुकते, मंजिल तो दूर हमारी थी।
परछाई साथ नहीं चलती, ये कदम भी तो हैं थक जाते।
शेर:
परछाई मेरी छोड़ गई, जब शाम ढली और रात आई।
तेरी यादों ने साथ नहीं छोड़ा, वह संग रही और साथ में आई।
शेर:
हम उलझे रहे ख्यालों में, कुछ अनसुलझे सवालों में।
जिनके जवाब हम ढूंढते रहे, बस हर रोज तेरे ख्यालों में।
मक़्ता:
'प्रभात' हम खुद ही बहक गए, खुद ही बहक गए।
अपने इन हालातों को बहकाते बहकाते।
आखरी पंक्ति:
हालात बड़े थे उलझे उलझे, हम सुलझाते तो कैसे सुलझाते।
Sunday, 15 February 2026
हालत बड़े थे उलझे उलझे,हम सुलझाते तो कैसे सुलझाते।
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