Friday, 27 February 2026

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

ढाँचा एक हड्डी का थे वह,

आदर्शों पर रहता था काबू,

सत्य अहिंसा अस्त्र थे उनके, 

विश्व पुकारे कह कर बापू।

सत्य का साधक ऐसा, 

जो अन्यत्र कहीं ना मिल पाए,

एक युग बीते तभी तो, 

एक युग पुरुष धरा पर आए।

​सच्ची मानवता का अनुराग, 

सदैव हृदय में उनके समाता था,

सुख-दुख पर था निर्वाद राज, 

पर पीड़ा पीना आता था।

साधन कैसा हो साध्य का, 

बापू को नित्य ध्यान रहा,

बैरी का भी हृदय में उनके 

सदा बसा सम्मान रहा।

​त्याग व परमार्थ के पथ पर

 वह अग्रज बन बढ़ते जाते थे,

शस्त्र सुसज्जित दल भी उनको 

निहत्था देख घबराते थे।

नेतृत्व ऐसा था बापू का, 

जब जेल में बंद हो जाते थे,

बापू का लेकर नाम नागरिक, 

आज़ादी के पथ बढ़ते जाते थे।

​ब्रिटिश राज्य का दंभ तोड़ा था 

मेरे बापू ने, एक राष्ट्र दिया, 

एक दी आवाज़ जनता को मेरे बापू ने।

संगठित समाज का सपना वो, 

अधूरा अधूरा सा है अपना वो, 

जिसमें भारती मात्र भारती है।

कैसे पूरी हो कल्पना वो

​जिस पथ का बापू ने ज्ञान दिया है, 

हमने न उसका ध्यान किया।

उच्च वर्ण और मद दौलत का, 

तब पग पग पर अभिमान किया।

क्षुद्र मनोरथ के कारण 

भ्रष्टाचार खुला हम करते हैं,

ना राष्ट्र और ना राष्ट्रहित, बस अपनी तिजोरी भरते हैं।

​संदेश आज राष्ट्र को,

 नेतृत्व भी ऐसा देता है,

खुलेआम पैसे को 

वह खुदा के जैसा कहता है,

संगठित भाव सरकार का यह,

 अपनी ढपली अपना राग।

दिव्य चक्षु से देखो अपने ,

संसद में जूते चलते आज,

प्रतिनिधि बनके जो आते हैं, 

चुनाव में पैसा पानी सा बहाते हैं,

अल्पमत की सरकार में वो 

करोड़ों में बिक जाते हैं, 

धन जन की नित क्षति होती है,

 सरकारें आती जाती हैं,

अरबों रुपयों में बनी सरकार

 तेरह दिन में गिर जाती है।

महंगाई की मार से जनता है

 त्रस्त, न घबराती है।

एक चुनाव गया दूसरा आया,

 फिर उसमें लग जाती है।

 रामराज की कल्पना 

कहीं खो गई और रोटी है।

 निर्धनता पल-पल बढ़ती है।

 भूखे के पास न रोटी है।

बापू ने जो राज दिया, 

वह प्रजातंत्र कहलाता है।

 ऐसे प्रजातंत्र को करो विदा,

 जिससे बापू का ना कोई नाता।

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