[Intro - धीमा और गंभीर संगीत, बाँसुरी की धुन]
[Verse 1]
उन्नति के चरम शिखर से, मनुज धरा पर आता है।
पतन और उत्थान से, सदियों से उसका नाता है।
विश्व धरा पर मानव का उद्गम, नहीं कोई चमत्कारी माया है।
मानव होगा तब मानव है, वह नहीं अंतरिक्ष से आया है।
[Verse 2]
अपने ही करों से उसने, विश्व धरा कश्रृंगार किया।
मानव को कालजयी बनाया, सृजनता का उपहार दिया।
उसके सृजन की गाथा को, हर युग का सम्मान मिला,
उसके सृजन की गाथा को, हर युग का सम्मान मिला,
किंतु प्रतीत हुआ यह, वह मानवता से अनभिज्ञ मिला।
किंतु प्रतीत हुआ यह, वह मानवता से अनभिज्ञ मिला।
है रूप अलग, है रंग अलग, गुण और विचारों में अलग-थलग।
है रूप अलग, है रंग अलग, गुण और विचारों में अलग-थलग।
उत्कृष्ट ये गुण प्रकृति का, स्वयं अभी तो है अलग-थलग।
परिवर्तन चक्र न रुकने पाता, निर्वात गति बहता जाता,
जहाँ धीर गंभीर गहरे सागर हों, पर्वतराज हिमालय बन जाता।
श
[Verse 3]
अपने सहज गुणों से प्रकृति, नित नई सीख सिखाती है।
निष्कपट, निर्मल, निश्चल, उमंग उल्लास आनंद बढ़ाती है।
यह प्रकृति काल रूप है, यह देवों का प्रतिरूप है।
नित्य निरंतर चिरंजीवी है, सुख-दुख विरक्त एक स्वरूप है।
[Bridge - तनावपूर्ण और चेतावनी भरा संगीत]
मनुष्य में भी वास इसी का, वह रहा सदा दास इसी का।
स्वामी बनने की अभिलाषा में, सदा करता उपहास इसी का।
जब विचार शून्य मस्तिष्क होते, तब मानवता अश्रु बहाती,
जब विचार शून्य मस्तिष्क होते, तब मानवता अश्रु बहाती,
प्रलय रूपी अंधियारा छा जाता, मनुज तेरी सृजनता खो जाती।
प्रलय रूपी अंधियारा छा जाता, मनुज तेरी सृजनता खो जाती।
[Chorus Repeat - उच्च ऊर्जा के साथ]
है रूप अलग, है रंग अलग, गुण और विचारों में अलग-थलग।
उत्कृष्ट ये गुण प्रकृति का, स्वयं अभी तो है अलग-थलग।
परिवर्तन चक्र न रुकने पाता, निर्वात गति बहता जाता,
जहाँ धीर गंभीर गहरे सागर हों, पर्वतराज हिमालय बन जाता।
[Outro - तीव्र और गंभीर चेतावनी]
धरा पर अब तक उसने पीयूष स्रोत बरसाया है,
धरा पर अब तक उसने पीयूष स्रोत बरसाया है,
दुर्बुद्धि मनुज तुझे ना वह रास आया है।
दुर्बुद्धि मनुज तुझे ना वह रास आया है।
सावधान! संधान संहारक वाणों का,
सावधान! संधान संहारक वाणों का,
काल देव के मन में आया है... काल देव के मन में आया है।
काल देव के मन में आया है... काल देव के मन में आया है।
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