Monday, 23 February 2026

बादल

बादल 
बादल मेरे गांव में आया 
देखा तो रंग काला था 
श्याम व्यंजना घोर गर्जना 
राक्षसा मतवाला था 
बादल मेरे गांव में आया 
देखा तो रंग काला था 
भंवर झंझावत नदियों से मांगे 
उदड़ता पवनों से चुराई 
हिमराज हिमालय सा रूप बनाया 
समुद्रों सी अटहास लगाई 
उसकी सांसों में से उद्गम था 
प्रलय काल ज्वाला का 
बादल मेरे गांव में आया देखा तो रंग कालाथा 
भोला अब आपके बरसुंगा ऐसे 
वसुंधरा में पानी को तरसे 
मैं आऊंगा मैं जाऊंगा 
त्राहिमाम तुझसे कहलाऊगा
ग्रीष्म में जब मेरा होगा आना 
खेतों में उपजेगा न कोई दाना
शरद ऋतु में जब आऊंगा 
शीतलता का एहसास कराऊंगा 
वर्षा ऋतु में जलमग्न धरा करके 
शंकर संहारक सा कहलाऊंगा 
तूने ही तो हो अज्ञानी 
दिया विश्व का प्याला था 
बादल मेरे गांव में आया देखा तो रंग काला था 
 संगी सहचर सब ऋतुए मेरी
क्रुध वो‌ भौ‌ है निर्ममता पर तेरी।
शीत का अनुबंध ग्रीष्म ऋतु से 
 ग्रीष्म काल में वो आएंगी
तुझे हाथ तपवायेगी आएंगे
वर्षा का अनुबंध हुआ जिस्म से 
वो भी ग्रीष्म ना अब आऐगी 
पानी की बूंद-बूंद को 
भीषण गर्मी में तरसाएंगी 
इन ऋतुओ की अपने गले में 
पहने वो वरमाला था 
बादल मेरे गांव में आया देखा तो रंग काला था 
वीर पुरुषो के जैसी 
सामर्थ्यता थी उसमें 
शस्त्र सासों का था 
अनुराग समाया
प्रलय  कारी रूद्र रूप बनाकर
अबकी बार जब गांव में आया अपने प्रचंड   वाणो से उसने 
मेरे गांव को झील बनाया
बादल मेरे गांव में आया देखा रंग काला था

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