बादल
बादल मेरे गांव में आया
देखा तो रंग काला था
श्याम व्यंजना घोर गर्जना
राक्षसा मतवाला था
बादल मेरे गांव में आया
देखा तो रंग काला था
भंवर झंझावत नदियों से मांगे
उदड़ता पवनों से चुराई
हिमराज हिमालय सा रूप बनाया
समुद्रों सी अटहास लगाई
उसकी सांसों में से उद्गम था
प्रलय काल ज्वाला का
बादल मेरे गांव में आया देखा तो रंग कालाथा
भोला अब आपके बरसुंगा ऐसे
वसुंधरा में पानी को तरसे
मैं आऊंगा मैं जाऊंगा
त्राहिमाम तुझसे कहलाऊगा
ग्रीष्म में जब मेरा होगा आना
खेतों में उपजेगा न कोई दाना
शरद ऋतु में जब आऊंगा
शीतलता का एहसास कराऊंगा
वर्षा ऋतु में जलमग्न धरा करके
शंकर संहारक सा कहलाऊंगा
तूने ही तो हो अज्ञानी
दिया विश्व का प्याला था
बादल मेरे गांव में आया देखा तो रंग काला था
संगी सहचर सब ऋतुए मेरी
क्रुध वो भौ है निर्ममता पर तेरी।
शीत का अनुबंध ग्रीष्म ऋतु से
ग्रीष्म काल में वो आएंगी
तुझे हाथ तपवायेगी आएंगे
वर्षा का अनुबंध हुआ जिस्म से
वो भी ग्रीष्म ना अब आऐगी
पानी की बूंद-बूंद को
भीषण गर्मी में तरसाएंगी
इन ऋतुओ की अपने गले में
पहने वो वरमाला था
बादल मेरे गांव में आया देखा तो रंग काला था
वीर पुरुषो के जैसी
सामर्थ्यता थी उसमें
शस्त्र सासों का था
अनुराग समाया
प्रलय कारी रूद्र रूप बनाकर
अबकी बार जब गांव में आया अपने प्रचंड वाणो से उसने
मेरे गांव को झील बनाया
बादल मेरे गांव में आया देखा रंग काला था
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