शीर्षक: मोहब्बत और कयामत (एक रूहानी संवाद)
[प्रारंभ: धीमी और गूँजती हुई आवाज]
शान-ए-इंसां की खुदा ने, क्या खूब रखी है,
दौलत-ए-ग़म भी बख़्शी, और मोहब्बत भी दी है।
[धैर्य और भावुकता के साथ]
इक नेक बंदे ने, मालिक से ये सवाल किया,
"ऐ खुदा! इस जहाँ का, क्या अंजाम होगा भला?
कब मिटेगी दुनियादारी? कब ये मंज़र बदलेगा?
कौन सा वो दिन होगा, जब कयामत का सूरज ढलेगा?"
[जवाब में खुदा की आवाज़ - गूँज और गहराई के साथ]
रब ने फ़रमाया: "बंदे! फ़क्र है तुझपे मुझे,
सुन ले अब जवाब मेरा, जो पूछा है तूने मुझसे।
याद कर ले वो निशानियाँ, जब बुराई आम होगी,
हया मिटेगी आँखों से, और रुसवा शाम होगी।
जब बिकने लगेगी सच्चाई, और ईमान खो जाएगा,
समझ लेना मेरे बंदे, तब कयामत का वक्त आएगा।"
[इंसान की पुरज़ोर विनती - तड़प भरी आवाज़]
बंदा बोला: "ऐ मौला! क्या दुनिया तबाह होगी?
क्या तेरी इस मख़लूक पर, कोई इनायत नहीं होगी?
तू चाहे तो दरिया सुखा दे, पत्थर में आग लगा दे,
तू चाहे तो अपने बंदों की, बिगड़ी तकदीर बना दे।
क्या तेरा नेक बंदा भी, इस आग में झुलसेगा?
क्या तू अपने बंदों पर, अब रहम नहीं करेगा?"
[खुदा का पैगाम - शांत और प्रभावशाली]
खुदा ने कहा: "बंदे! मैंने तुझे मोहब्बत के लिए बनाया,
पर तूने तो नफ़रत को, अपना रहबर बनाया।
फिर क्यों न जले ये दुनिया, जब दिल ही काले हैं,
नफ़रत की इस आग के, सब खुद ही हवाले हैं।"
[तौबा का मंज़र - धीमी और रुआँसी आवाज़]
बंदा रोकर पुकारा: "सब तो शैतान नहीं हैं,
कुछ भटक गए हैं रास्तों से, वो नादान इंसान हैं।
रहम फरमा उन पर भी, उन्हें सही राह पे लाना,
भटके हुए बंदों को, फिर अपने गले लगाना।"
[उम्मीद की किरण - बुलंद आवाज़]
"जब वो मेरे सजदे में, अपना सर झुका लेंगे,
सच तो यही है बंदे, हम उन्हें अपना बना लेंगे।
जो नेक राह पे चलेंगे, उन्हें जन्नत अता होगी,
जो नफ़रत को पालेंगे, उन्हें दोज़ख़ की सज़ा होगी।"
[उपसंहार: ईद और मोहब्बत का संदेश]
झुक गया सजदे में इंसान, तौबा की हर गुनाह से,
वादा किया मोहब्बत का, हटा हाथ गुनाह से।
रमज़ान की बरकत से, जब दिल साफ़ हुए सबके,
गले मिले जब ईद पे, तो साए छँटे नफ़रत के।
नवाज़ और ज़कात का पैगाम, जब तक घर-घर जाएगा,
चलेंगे नेकी की राह पे, तो कयामत का दिन नहीं आएगा।
माँ बेटे को मोहब्बत की, वो लोरी सुनाएगी,
और इस जहाँ में बस, खुदा की मोहब्बत बढ़ जाएगी।
मां में ही वह रुह बनाई थी मैने
जिसमें अपनी जन्नत भी समाई थी
मैने
आज वही मां शर्मसार होती है
जब उसका लाडला इंसानों का खून बहता है
वो मां तो हर एक में बेटा देखती हैं
क्योंकि वह चश्म भी मैंने उसे अदा की है
इस जहां में एक सूरज एक चांद एक धरती बनाई मैंने
और उसमें अपनी खुदाई भी समायी मैंने।
मगर अफसोस हर रोज लहू लुहान यह धरती होती है
सभी मजहबों की रुह तो यही धरती होती है
अमन और सुकून से सभी को साथ लेना है
बड़ी जालिम फितरत निकली इंसान की
उसे तू जहांन लेना था
इसी फितरत से आज इसमें कम पर पहुंचा है
अमन और सुकून का मेरा पैगाम उसे रास नहीं आया है
वह दिन दूर नहीं जबअब कयामत होगी
मगर जब तक जिंदा है मां की मोहब्बत इनायत होगी
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