(मुखड़ा - Intro)
दिलों के फासलों को कोई पाटना नहीं चाहता,
मेरा रहनुमा है कैसा, जो दर्द मेरे बांटना नहीं चाहता।
दिलों के फासलों को कोई पाटना नहीं चाहता,
मेरा रहनुमा है कैसा, जो दर्द मेरे बांटना नहीं चाहता।
(अंतरा 1)
कोई कुत्ता, कोई लकड़बग्घा, तो कोई शेर कहता है,
कैसा जानवर है, जो शहर से भागना नहीं चाहता।
कोई कुत्ता, कोई लकड़बग्घा, तो कोई शेर कहता है,
कैसा जानवर है, जो शहर से भागना नहीं चाहता।
(अंतरा 2)
नफ़रत के सौदागर को मोहब्बत रास नहीं आती,
इस कदर मजबूर है, कि दीवार फांदना नहीं चाहता।
नफ़रत के सौदागर को मोहब्बत रास नहीं आती,
इस कदर मजबूर है, कि दीवार फांदना नहीं चाहता।
(अंतरा 3 - हाई पिच / High Pitch)
सरों पर छत नहीं और पेट भी खाली है रियाया का,
अपनी थाली का एक टुकड़ा भी, कमबख्त बांटना नहीं चाहता।
सरों पर छत नहीं और पेट भी खाली है रियाया का,
अपनी थाली का एक टुकड़ा भी, कमबख्त बांटना नहीं चाहता।
(अंतरा 4)
मेरे पास वोट है और उसके पास जोर नोटों का,
मेरी ताकत को वो इंसानियत से आंकना नहीं चाहता।
मेरे पास वोट है और उसके पास जोर नोटों का,
मेरी ताकत को वो इंसानियत से आंकना नहीं चाहता।
(अंतरा 5)
वह अंधेर नगरी का कुछ ऐसा रहनुमा निकला,
चिरागों का दिखावा है, अंधेरा छांटना नहीं चाहता।
वह अंधेर नगरी का कुछ ऐसा रहनुमा निकला,
चिरागों का दिखावा है, अंधेरा छांटना नहीं चाहता।
(अंतरा 6 - तीव्र गति / Fast Tempo)
यहाँ जल रही हैं बस्तियां फिरका-परस्ती में,
वह अपने हाथों से ये मंजर बदलना नहीं चाहता।
यहाँ जल रही हैं बस्तियां फिरका-परस्ती में,
वह अपने हाथों से ये मंजर बदलना नहीं चाहता।
(अंतरा 7)
मेरे जख्मों पर मरहम भी बहुत खूब लगाता है,
मगर जख्म हरे रखता है, उन्हें भरना नहीं चाहता।
बड़ा अजीब मंजर है जो रोज देखता हूँ मैं,
कि कड़वाहट का सच अब कोई चखना नहीं चाहता।
(इस हिस्से को एक साथ, थोड़ा जल्दी गया जा सकता है)
(अंतरा 8)
खुदगर्जी है तो बनके भिखारी मेरे घर पर आया है,
देकर मुझे खुशियां, मेरे गम मांगना नहीं चाहता।
खुदगर्जी है तो बनके भिखारी मेरे घर पर आया है,
देकर मुझे खुशियां, मेरे गम मांगना नहीं चाहता।
(मक्ता - Outro / Slow & Emotional)
सियासत की इस धूप में सभी जल रहे हैं 'प्रभात',
मगर यहां हर रहनुमा सच की आंखों में झांकना नहीं चाहता।
सियासत की इस धूप में सभी जल रहे हैं 'प्रभात',
मगर यहां हर रहनुमा सच की आंखों में झांकना नहीं चाहता...
झांकना नहीं चाहता...
दिलों के फासलों को कोई पाटना नहीं चाहता,
मेरा रहनुमा है कैसा, जो दर्द मेरे बांटना नहीं चाहता।
कोई कुत्ता, कोई लकड़बग्घा, तो कोई शेर कहता है,
कैसा जानवर है, जो शहर से भागना नहीं चाहता।
नफ़रत के सौदागर को मोहब्बत रास नहीं आती,
इस कदर मजबूर है, कि दीवार फांदना नहीं चाहता।
सरों पर छत नहीं और पेट भी खाली है रियाया का,
अपनी थाली का एक टुकड़ा भी, कमबख्त बांटना नहीं चाहता।
मेरे पास वोट है और उसके पास जोर नोटों का,
मेरी ताकत को वो इंसानियत से आंकना नहीं चाहता।
वह अंधेर नगरी का कुछ ऐसा रहनुमा निकला,
चिरागों का दिखावा है, अंधेरा छांटना नहीं चाहता।
यहाँ जल रही हैं बस्तियां फिरका-परस्ती में,
वह अपने हाथों से ये मंजर बदलना नहीं चाहता।
मेरे जख्मों पर मरहम भी बहुत खूब लगाता है,
मगर जख्म हरे रखता है, उन्हें भरना नहीं चाहता।
बड़ा अजीब मंजर है जो रोज देखता हूँ मैं,
कि कड़वाहट का सच अब कोई चखना नहीं चाहता।
खुदगर्जी है तो बनके भिखारी मेरे घर पर आया है,
देकर मुझे खुशियां, मेरे गम मांगना नहीं चाहता।
सियासत की इस धूप में सभी जल रहे हैं' प्रभात'....."
मगर यहां हर रहनुमा सच की आंखों में झांकना नहीं चाहता
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