Thursday, 12 February 2026

राष्ट्र का स्वरूप और हिंदी (completed)

[Spoken Word]

[Verse 1]

माटी मेरे भारत की है जो सबकी जानी पहचानी है। 

हो महाराष्ट्र या कोलकाता आज हिंदी क्यों वैगानी है।

[Verse 2]
संस्कृति को क्यों कर रहे मलिन। 
क्यों भाषाओं का बैर बढ़ाते हो।।
इस माटी का ही उपजा अन्न ।
हर दिन जिसको तुम खाते हो।।
तुम सिंधी बोलो या माराठी
या वो बोलो‌ जो तुम्हारी भाषा है।
[Verse 3]
भाषाओ से बैर क्यों खाना है।
जब संस्कृत सबकी अधिष्ठाता है।।
ये क्षेत्रवाद और भाषावाद 
क्या एक नयी सभ्यता की संतति है।
इसमें तुम्हारा अस्तित्व समाया है 
और तुम्हारी शक्ति झलकती है।।
तुम उसे शिवाजी के वंशज हो।
जो हिंदू राष्ट्र के संस्थापक हैं।
तुम कौन हो स्वयं को पहचानो। 
खुद पर तो चप्पल मत तानो।।
[Verse 4]
भारतमाता के भाल  के तुम हो कलंक।
क्यों संस्कृति को विस्मित करते हो।
उदारता और सहिष्णुता जिसके दो गुण अमिट।
तुम उनको ही धता बताते हो।।
जो मां भारती के संस्कृति के मुकुट की 
सुसज्जित और सुशोभित होती है मणियां।
अंगनित भाषाए है क्या मराठी क्या उडिया।।
[Verse 5 ]
देवनागरी हिंदी तो संस्कृत सी पावन है।
गंगा जमुना का उद्गम है बसंत है सावन है।।

[Chorus

(Emotional and High Pitch

बिन हिंदी के राष्ट्र का स्वरूप 
एक कल्पना मात्र ही होगा। 
जो विरोध करेगा हिंदी का। 
वह सपुत्र राष्ट्र का नहीं होगा।।
मां भारती के सपूतों को 
एक सपना साकार करना होगा। 
एक उच्च शिखर पर राष्ट्रभाषा का 
सबको सम्मान करना होगा।।


Outro]

भाषाओं का बैर क्यों...

संस्कृति को न करो मलिन...

हम अपनी संस्कृति के सूक्ष्म रूप को। 

क्यों कर विस्मित कर रहे आज।
सब भाषाओं की जननी है संस्कृत है। 
राष्ट्रभाषा हिंदी सब भाषाओं का है ताज।


Outro]

[Verse 1]

भाषाओं का बैर क्यों...

संस्कृति को न करो मलिन...


​"विश्व की समस्त भाषाओं की आदि जननी और ज्ञान का मूल स्रोत 'देववाणी संस्कृत' है। हिंदी, उसी महान और समृद्ध परंपरा की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी और संस्कृत की लाड़ली बेटी है। जिस प्रकार संस्कृत ने प्राचीन काल में विश्व को ज्ञान और संस्कारों से पोषित किया, उसी प्रकार आज हिंदी हमारे राष्ट्र की एकता और अखंडता की सशक्त डोरी है।

​यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का वह सजग प्रहरी है, जो संविधान में वर्णित और विश्व की अन्य सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए, उन्हें अपने भीतर समाहित कर एक समन्वयात्मक संस्कृति का निर्माण करती है। अतः हमारी राष्ट्रीयता को प्रबल बनाने और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के भाव को जीवंत रखने के लिए, अपनी जननी संस्कृत के संस्कारों को संजोए हुए हिंदी का प्रसार और सम्मान नितांत आवश्यक है।"

हिंदी भारत की पहचान, एकता और गौरव का प्रतीक है। यह हमारी राजभाषा है और समस्त भाषाओं को अपने अंदर समेटते हुए, राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करती है। राष्ट्र के विकास के लिए इसका प्रयोग आवश्यक है








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