कैसा है और है कहां हमने ना देखा प्यार को।
जो हमारे दिल में रहता ढूंढते दिलदार को।
लिखने वाले ने नसीब लिख दिया कुछ इस तरहा।
कोई खुशी ना रह सकी पहलू में दिन चार को।
उसकी बेरुखी से हम इस कदर मायूस थे
देखते रहे धूल में मिलते हुए अपने हर अरमान को
ये जाल किस्मत ने बिछाया इल्जाम क्यों तुझको दूं
बेहतर होता अगर तू समझता मेरे जज्बात को
धड़कने थमने को है अब मरे और तब मरे।
देखने भी ना आ सका अपने गमे बीमार को
पतझड़ों के बाद फिर आऐगी बहारे एक बार।
इसलिए भुला नहीं हूं कातिल अपने यार को।
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