नित नई उड़ानें भरने को
आतुर जो हृदय रहता था,
वह कहता है बस और नहीं।
नहीं गंतव्य भाया मुझे,
मैं थक कर अब चूर हूँ।
क्या कहूँ कि अब मजबूर हूँ,
हर पथ एक सा लगता है,
सब कुछ अनजाना लगता है
किस ओर बढ़ूँ और क्यों कर मैं,
जब छाया भी अपनी धुंधली सी लगती है, कुछ नयापन नहीं लगता है,
सब साथ रहे, सब साथ में हैं,
कोई साथ नहीं यह भूला ना लगता है,
मन के उल्लास को खोकर भी
क्या जीवन हर्षित होता है।
ना फसल बोई, ना लहराई,
ऐसा भी क्या कभी होता है।
किंचित नहीं दोष इसमें मेरा कोई,
यह माया है सब इस जग की।
जिसमें हर अपना बेगाना खोता है
बस कुछ पल दिल रोता है
आओ कुछ और बात करें
हम सपनों में फिर एक रात करें
फिर भर में जब हम जागेगे
कल पुर्जो से इधर-उधर भागेंगे
कोई नहीं नया एहसास होगा
यह प्रभात भी नहीं नया होगा
व्यथा की गाथा गुथ जाएगी
बस यूं ही उम्र ढलती जाएगी
अतीत की कहानी नई नहीं होगी
अपना गंतव्य पहचाना सा है
जिसे अपना मैंने समझा था
वो सब तो अंजाना सा है
एक नई रहा एक नया बसेरा
जाने कहां अब होगा मेरा
उपवन में जब फूल खिलते हैं
कुछ साखों पर ही मुरझा जाते हैं
उनका अपना प्रारब्ध यही
बस उपवन को महकाते हैं
मैं उपवन नहीं एक पुष्प ही हूं
जो इसी अर्थ यहां पर आया है
नहीं पाने की अभिलाषा कोई
अपना सर्वस मैंने लुटाया है।
फिर भी हृदय में संतुष्टि है
यह हृदय भी मुस्कुराता है
है सुगंध बसी इसमें मानवता की
इसी मानवता को वह चाहता भी है
मानवता के पथ पर चलते चलते
थक कर कहीं रुक जाऊंगा
उत्साह उल्लास जगेगा जब-जब
मैं गीत मानवता के ही गाऊंगा
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