Wednesday, 18 February 2026

मनुज भेष में छुपाया दानव

मानवता का रक्त बहाता,
 शिशुओं को अनाथ बनाता। 
मनुज भेष में छिपा यह दानव,
  मनुज का हत्यारा है, 
कोई नहीं है ईश्वर इसका
सना रक्त से मुख है इसका।
भय आतंक के परिधान में लिपटा,
इसे दर्शन प्यारा है।
 शवों का व्यापार चलाता, 
दुकान कफ़न की इसने खोली।
 एक ही भाषा बोल रहा ये
 चला चला बंदूक की गोली।
 अब तक की इसने अपने मन की, 
खेली होली में रक्त की होली। 
रक्त पिपासु इस नरपिशाच को,
 रंग लाल ही प्यारा है। 
कठिन परिश्रम से घर हम जो बनाएँ, उनमें है यह आग लगाये।
 झुलस रहे हैं गात हमारे, 
बनकर वैद्य मरहम ये लगाए।
 जानो इसकी माया है कैसी,
 काला मन सूरत भी वैसी।
 दिखे न जिसमें निज कर भी अपने,
 यह वह अंधियारा है। 
भ्रमित हृदय, भ्रमित मस्तिष्क इसका, सगा नहीं कोई मनुज है इसका। 
छीन के रोटी और लंगोटी, 
उदर भरा है हर दिन इसका। 
मनुज कर्म कैसा करते हैं, 
घृणा अबोध हृदय में भरते हैं।
 आतंक के इन दानव का, 
अंत नहीं क्यों अब करते हैं। 
हम हैं मनुज और ये 
घोर शत्रु हमारा है। 

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