नज़्म: इबादत-ए-एहसास
दिल ने कहा तुमसे कहूं,
मैंने कहा कैसे कहूं।
दिल ने कहा निगाहों से कह,
मैंने कहा उसे देखता ही नहीं।
दिल ने कहा फिर भी चाहत है,
मैंने कहा उसकी दिल में इबादत है।
दिल ने कहा तू तन्हा ही जी,
मैंने कहा उसकी यादें मेरे साथ हैं।
[अगले पड़ाव (अशआर):]
दिल ने फिर एक सवाल किया—
कि जो पास नहीं, वो प्यारा क्यों है?
बिन मंज़िल का ये आवारा सफ़र,
तुझे उम्र भर का सहारा क्यों है?
मैंने कहा—
मोहब्बत आँखों की मोहताज नहीं होती,
हर हकीकत में रूह की आवाज़ नहीं होती।
उसे पाना मेरा मक़सद ही नहीं,
क्योंकि खुदा को पाने की कोई रस्म-ओ-रिवाज़ नहीं होती।
दिल ने कहा—
कि वो मशरूफ़ है अपनी दुनिया में,
तू क्यों उसकी यादों में राख होता है?.....
मैंने मुस्कुरा कर कहा—
इश्क जब इबादत की दहलीज़ छू ले,
तो रकीब का डर भी पाक होता है।
अब न 'मैं' बचा, न 'दिल' की कोई बात रही,
बस उसकी याद की सल्तनत और मेरी सारी रात रही।
Friday, 13 February 2026
दिल ने कहा तुमसे कहूं,
दिल ने कहा तुमसे कहूं,
मैंने कहा कैसे कहूं।
दिल ने कहा निगाहों से कह,
मैंने कहा उसे देखता ही नहीं।
दिल ने कहा फिर भी चाहत है,
मैंने कहा उसकी दिल में इबादत है।
दिल ने कहा तू तन्हा ही जी
मैंने कहा उसकी यादें मेरे साथ हैं।
दिल ने कहा तुमसे कहूं,
मैंने कहा कैसे कहूं।
दिल ने कहा निगाहों से कह,
मैंने कहा उसे देखता ही नहीं।
दिल ने कहा फिर भी चाहत है,
मैंने कहा उसकी दिल में इबादत है।
दिल ने कहा तू तन्हा ही जी
मैंने कहा उसकी यादें मेरे साथ हैं।
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