[spoken word]
जहाँ मैं खड़ा था, वह गरीबों की बस्ती थी। मैंने देखा एक तरफ तंग परस्ती
को,
दूसरी तरफ बेख्याली सी मस्ती थी।
वो गौर वर्ण का बालक जो मेरे सामने खड़ा था,
मासूम भोला बड़ा था।
कुछ काले गड्ढे उसकी आँखों के,
नीचे थे पड़े।
लगता था जैसे हफ्ते में चार फाके हो पड़े।
मैंने जेब से चॉकलेट निकाली
और उसकी ओर बढ़ाई।
वह नहीं समझा कि,
यह थी बच्चों की प्रिय चीज।
वास्तव में यह तंग परिस्थिति भी है अजीब
इसका शिकार एक वृद्ध दूसरी ओर बैठा हुआ रहा था खास,
अटक अटक के चल रही थी,
उसकी साँस।
मैंने पूछा बाबा कोई दवाई ली
वह बोला कहां से लाऊं दवाई
चार वक्त से रोटी नहीं खाई
मैंने जेब से पर्स निकाला,
सौ का नोट उसे बढ़ाया।
वह बोला भीख नहीं चाहिए,
घर में जवान बेटा है,
कोई नौकरी दिलाइए।
इतने में उसका जवान बेटा,
बाहर से कहीं से आया।
मुझे खड़ा देखा तो सकपकाया।
उसके हाथ में थोड़ा सा आटा था।
सारी बस्ती में मौत का सन्नाटा था।
उस मलिन बस्ती में इच्छाएँ मौन थीं,
कोई नहीं जानता था खुशियाँ कौन थीं।
वह जानते थे वोट को,
पहचानते थे सौ के नोट को।
इससे वर्ष में 500 की आय उन्हें होती है
जो उनकी दो माह की रोटी है।
कुछ सस्ता गल्ला सरकार उन्हें देती है।
नेता आते हैं और आश्वासन देते हैं, गरीबी हटाएँगे।
नेता आते हैं आश्वासन देते हैं
गरीबी हटाएंगे।
न जाने इस तंगपरस्ती और मस्ती की बस्ती,
कौन से शहर में ले जाकर बसाऐगे।
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