Thursday, 19 February 2026

आज फिर आग फिज़ाओं से बरसती है,

आज फिर आग फिज़ाओं से  बरसती है,

उम्मीद दो बूँद पानी की, क्यों कर है।

मेरे वतन की मिट्टी है पसीना भी मैंने बहाया है

फिर रोटी की अपनी अपनी यह मनमानी क्यों कर है

जब दौर ही नफ़रतों का है  हमसाया,

बात मासूम जिंदगानी की क्यों कर है।

मछलियाँ समझ न सकीं  इतना,

दरिया का रुख तूफ़ानी क्यों कर है।

ये जहाँ मेरा है, तेरा है, हम सबका है,

अकेले इसे पाने की तुझे दीवानगी क्यों कर है।

ज़माना भी यही था, वो भी यहीं था पर अब नहीं,

मेरी कौम अब तक इस तरह चुप क्यों कर है।

मज़हब की बेड़ियों में ही जब बँधकर रहना है,

ज़हन में आज़ादी की ये दीवानगी क्यों कर है।

मेरी ज़िंदगी खरीद कर तुम ख्वाब दिखाते हो,

फिर चंद साँसों की मुझे मोहलत क्यों कर है।

हाथों में खंजर और लव पर तुम्हारे दुआएं है 

इंसान  मैं भी हूं मुझ पर इतनी मेहरबानी क्यों कर है?

धूप का सफर है मंजिल है, पर साया साथ नहीं

मेरे और उसके बीच में इतना फासला क्यों कर है

परिंदों की चहक बता रही है वो लौट आए हैं

मगर इन घरों में अब तक बिरानगी क्यों कर है

अपनी हरकतों से ,वो शैतान के सानी हैं,

उनके धड़ पर चेहरा इंसानी क्यों कर है।

अज़ाब तुझ पर है मासूमों का खून वहाया तूने

उसने तुझे जन्नत का ख्वाब दिखाया क्यो कर है



















 

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