[Structure: Repetitive Folk Style]
[Vocal Instruction: Do not sing headings or bracketed text]
[Mood: Dark, Somber, Reflective]
(Verse 1)
खून को खून नहीं पहचाने, कैसी मति गई मारी रे।
खून को खून नहीं पहचाने, कैसी मति गई मारी रे।
एक दूजे की खून की प्यासी, लगती दुनिया सारी रे।
एक दूजे की खून की प्यासी, लगती दुनिया सारी रे।
(Verse 2)
कैसी अनोखी रीत बनाई, जो है सबसे न्यारी रे।
कैसी अनोखी रीत बनाई, जो है सबसे न्यारी रे।
आपा धापी लूट खसोट की, देखो चली बयारी रे।
आपा धापी लूट खसोट की, देखो चली बयारी रे।
(Verse 3)
जिन छप्पर पे फूस नहीं था, उनमें आग लगाई रे।
जिन छप्पर पे फूस नहीं था, उनमें आग लगाई रे।
शैतानों का राज हुआ है, देता मनुज ना दिखाई रे।
शैतानों का राज हुआ है, देता मनुज ना दिखाई रे।
(Verse 4)
स्नेह प्रेम के बंधन तोड़े, दया से ना कोई नाता रे।
स्नेह प्रेम के बंधन तोड़े, दया से ना कोई नाता रे।
जिन हृदय में भाव नहीं है, उनका कौन विधाता रे?
जिन हृदय में भाव नहीं है, उनका कौन विधाता रे?
(Verse 5)
खाने को रोटी नहीं है, फिर भी खरीद के गोली लाता रे।
खाने को रोटी नहीं है, फिर भी खरीद के गोली लाता रे।
कितना साहस भरा हृदय में, खून से ना घबराता रे।
कितना साहस भरा हृदय में, खून से ना घबराता रे।
(Verse 6)
लाशों के अंबार लगे हैं, कफन अपने पास ना रे।
लाशों के अंबार लगे हैं, कफन अपने पास ना रे।
साँसें छोटी होती हैं जाती, जीवन की कोई आस ना रे।
साँसें छोटी होती हैं जाती, जीवन की कोई आस ना रे।
(Outro)
प्रेम दया ना पास हमारे, बन गए आज भिखारी रे।
प्रेम दया ना पास हमारे, बन गए आज भिखारी रे।
समाज बना है जंगल आज, हम हैं हिंसक शिकारी रे।
समाज बना है जंगल आज, हम हैं हिंसक शिकारी रे।
खून को खून नहीं पहचाने
कैसी मति गई मारी रे,
एक दूजे की खून की प्यासी
लगती दुनिया सारी रे।
कैसी अनोखी रीत बनाई
जो है सबसे न्यारी रे,
आपधापी लूट खसोट की
देखो चली बयारी रे।
जिन छप्पर पे फूस नहीं था
उनमें आग लगाई है,
शैतानों का राज हुआ है
देता मनुज ना दिखाई रे।
स्नेह प्रेम के बंधन तोड़े,
दया से ना कोई नाता रे,
जिन हृदय में भाव नहीं है
उनका कौन विधाता रे?
खाने को रोटी नहीं है फिर भी
खरीद के गोली लाता रे,
कितना साहस भरा हृदय में
खून से ना घबराता रे।
लाशों के अंबार लगे हैं
कफन अपने पास ना रहे,
साँसें छोटी होती हैं जाती,
जीवन की कोई आस ना रे।
प्रेम दया ना पास हमारे
बन गएआज भिखारी रे,
समाज बना है जंगल आज ,
हम हैं हिंसक शिकारी रे।
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